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मालवांचल मित्र, नीमच: शहर सहित आसपास के क्षेत्रों में महिलाओं ने गुरुवार को श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दशा माता व्रत मनाया। इस अवसर पर महिलाओं ने सुबह स्नान कर घरों तथा मंदिरों में दशा माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति तथा मंगल की कामना करते हुए व्रत रखा। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में एकत्रित होकर दशा माता की कथा सुनती नजर आईं तथा पूजा के बाद प्रसाद वितरित किया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार दशा माता व्रत विशेष रूप से परिवार की “दशा” अर्थात स्थिति को शुभ और समृद्ध बनाने के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं पीपल या किसी पवित्र स्थान पर दशा माता की पूजा करती हैं और धागा बांधकर परिवार की रक्षा एवं उन्नति की प्रार्थना करती हैं। दशा माता व्रत कथा प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक समृद्ध राज्य में एक राजा और रानी रहते थे। रानी अत्यंत धार्मिक और श्रद्धालु थी, जबकि राजा इन बातों को ज्यादा महत्व नहीं देता था। रानी हर वर्ष श्रद्धा से दशा माता का व्रत रखती और पूरे विधि-विधान से पूजा करती थी। देवी की कृपा से राज्य में सुख-समृद्धि बनी रहती थी और प्रजा भी प्रसन्न रहती थी। एक बार राजा को रानी के व्रत और पूजा पर अहंकारवश हंसी आ गई। उसने कहा कि इन व्रत-उपवासों से कुछ नहीं होता। राजा के इस अपमान से दशा माता अप्रसन्न हो गईं और धीरे-धीरे राज्य में संकट आने लगे। राजकोष खाली होने लगा, प्रजा परेशान हो गई और राजपरिवार को भी अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। देखते ही देखते समृद्ध राज्य कठिन परिस्थितियों में आ गया। जब रानी को इसका कारण समझ में आया तो उसने सच्चे मन से दशा माता से क्षमा मांगी और पुनः पूरे नियम और श्रद्धा के साथ व्रत एवं पूजा-अर्चना की। रानी की भक्ति और पश्चाताप से देवी प्रसन्न हुईं। कुछ ही समय में राज्य की परिस्थितियां सुधरने लगीं, धन-धान्य की वृद्धि हुई और राज्य में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। राजा को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने देवी की महिमा को स्वीकार किया। कथा के अंत में बताया जाता है कि जो भी महिला श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ दशा माता का व्रत करती है, उसके परिवार की सभी विपत्तियां दूर होती हैं और घर में सुख, शांति तथा समृद्धि बनी रहती है। कथा श्रवण के बाद महिलाओं ने दशा माता की आरती उतारी और प्रसाद वितरित कर परिवार की खुशहाली की कामना की। |
मालवांचल मित्र, नीमच: शहर सहित आसपास के क्षेत्रों में महिलाओं ने गुरुवार को श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दशा माता व्रत मनाया। इस अवसर पर महिलाओं ने सुबह स्नान कर घरों तथा मंदिरों में दशा माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति तथा मंगल की कामना करते हुए व्रत रखा। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में एकत्रित होकर दशा माता की कथा सुनती नजर आईं तथा पूजा के बाद प्रसाद वितरित किया गया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार दशा माता व्रत विशेष रूप से परिवार की “दशा” अर्थात स्थिति को शुभ और समृद्ध बनाने के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं पीपल या किसी पवित्र स्थान पर दशा माता की पूजा करती हैं और धागा बांधकर परिवार की रक्षा एवं उन्नति की प्रार्थना करती हैं।
दशा माता व्रत कथा
प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक समृद्ध राज्य में एक राजा और रानी रहते थे। रानी अत्यंत धार्मिक और श्रद्धालु थी, जबकि राजा इन बातों को ज्यादा महत्व नहीं देता था। रानी हर वर्ष श्रद्धा से दशा माता का व्रत रखती और पूरे विधि-विधान से पूजा करती थी। देवी की कृपा से राज्य में सुख-समृद्धि बनी रहती थी और प्रजा भी प्रसन्न रहती थी।
एक बार राजा को रानी के व्रत और पूजा पर अहंकारवश हंसी आ गई। उसने कहा कि इन व्रत-उपवासों से कुछ नहीं होता। राजा के इस अपमान से दशा माता अप्रसन्न हो गईं और धीरे-धीरे राज्य में संकट आने लगे। राजकोष खाली होने लगा, प्रजा परेशान हो गई और राजपरिवार को भी अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। देखते ही देखते समृद्ध राज्य कठिन परिस्थितियों में आ गया।
जब रानी को इसका कारण समझ में आया तो उसने सच्चे मन से दशा माता से क्षमा मांगी और पुनः पूरे नियम और श्रद्धा के साथ व्रत एवं पूजा-अर्चना की। रानी की भक्ति और पश्चाताप से देवी प्रसन्न हुईं। कुछ ही समय में राज्य की परिस्थितियां सुधरने लगीं, धन-धान्य की वृद्धि हुई और राज्य में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। राजा को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने देवी की महिमा को स्वीकार किया।
कथा के अंत में बताया जाता है कि जो भी महिला श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ दशा माता का व्रत करती है, उसके परिवार की सभी विपत्तियां दूर होती हैं और घर में सुख, शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।
कथा श्रवण के बाद महिलाओं ने दशा माता की आरती उतारी और प्रसाद वितरित कर परिवार की खुशहाली की कामना की।