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मालवांचल मित्र, विशेष रिपोर्ट: Today in History | Sridevi Birthday Special | Bollywood History in Hindi 13 अगस्त 1963 को जन्मीं श्रीदेवी भारतीय सिनेमा की उन अदाकाराओं में शामिल हैं, जिनकी लोकप्रियता आज भी कायम है। उनके जन्मदिन पर उनकी सुपरहिट फिल्म ‘चालबाज़’ से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा याद करना खासा रोचक है। ‘चालबाज़’ के निर्देशक पंकज पराशर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब उन्हें निर्माता ए. पुरनचंद्र राव के साथ फिल्म बनाने का मौका मिला, तो उन्होंने सबसे पहले श्रीदेवी को फिल्म में लेने का सुझाव दिया। दिलचस्प बात यह थी कि उस समय पंकज पराशर के पास कोई तैयार कहानी नहीं थी। जब निर्माता ने पूछा कि श्रीदेवी के साथ किस तरह की फिल्म बनाना चाहते हैं, तो उन्होंने तुरंत कहा—“सीता और गीता।”
निर्माता ने श्रीदेवी से संपर्क किया और उनकी हामी मिल गई। लेकिन असली मजेदार किस्सा तब हुआ, जब पंकज पराशर की श्रीदेवी से पहली मुलाकात हुई। श्रीदेवी ने उनसे सिर्फ इतना कहा—“बताओ।” अब निर्देशक के सामने मुश्किल थी। ‘चालबाज़’ की स्क्रिप्ट तब तक लिखी ही नहीं गई थी। पंकज पराशर ने बिना घबराए ‘सीता और गीता’ की कहानी अपने अंदाज में श्रीदेवी को सुना दी। कहानी सुनने के बाद श्रीदेवी ने फिल्म के लिए हां कर दी। बाद में श्रीदेवी ने खुद पंकज पराशर को बताया कि उन्हें पता था कि कहानी ‘सीता और गीता’ की मूल अवधारणा पर आधारित है। वह जानबूझकर अनजान बनी रही थीं। उन्हें निर्देशक का आत्मविश्वास पसंद आया था। इसके बाद चेन्नई में फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम शुरू हुआ। इसी दौरान कमल हासन ने पंकज पराशर को सलाह दी कि मूल कहानी की बुनियाद को बनाए रखते हुए उसमें अपना निर्देशक वाला अंदाज जरूर जोड़ें।
और फिर बनी ‘चालबाज़’—जहां श्रीदेवी ने अंजू और मंजू के डबल रोल में ऐसा जादू दिखाया कि दोनों किरदार आज भी दर्शकों की यादों में अलग-अलग बसे हुए हैं। शूटिंग के शुरुआती दिनों में पंकज पराशर और श्रीदेवी के बीच ज्यादा बातचीत नहीं होती थी। लेकिन एक सीन का रफ कट देखने के बाद श्रीदेवी का नजरिया बदल गया। अगले दिन उनके घर से निर्देशक के लिए लंच आया और धीरे-धीरे दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई। फिल्म रिलीज हुई तो श्रीदेवी के अभिनय की खूब तारीफ हुई और उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। सरोज खान को भी फिल्म की शानदार कोरियोग्राफी के लिए फिल्मफेयर सम्मान मिला। आज का किस्सा, एक बड़ी सीख ‘चालबाज़’ की कहानी हमें बताती है कि सिनेमा में सिर्फ कहानी नहीं, उसे सुनाने का आत्मविश्वास भी मायने रखता है। पंकज पराशर के पास उस दिन पूरी स्क्रिप्ट नहीं थी, लेकिन उनके पास अपने विचार पर भरोसा जरूर था। और श्रीदेवी? वह सिर्फ कहानी सुनकर नहीं, कहानी सुनाने वाले के आत्मविश्वास को देखकर भी फैसला कर रही थीं। 13 अगस्त को श्रीदेवी के जन्मदिन पर उनकी याद में ‘चालबाज़’ का यह किस्सा आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे दिलचस्प किस्सों में शामिल है। |
मालवांचल मित्र, विशेष रिपोर्ट: Today in History | Sridevi Birthday Special | Bollywood History in Hindi
13 अगस्त 1963 को जन्मीं श्रीदेवी भारतीय सिनेमा की उन अदाकाराओं में शामिल हैं, जिनकी लोकप्रियता आज भी कायम है। उनके जन्मदिन पर उनकी सुपरहिट फिल्म ‘चालबाज़’ से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा याद करना खासा रोचक है।
‘चालबाज़’ के निर्देशक पंकज पराशर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब उन्हें निर्माता ए. पुरनचंद्र राव के साथ फिल्म बनाने का मौका मिला, तो उन्होंने सबसे पहले श्रीदेवी को फिल्म में लेने का सुझाव दिया।
दिलचस्प बात यह थी कि उस समय पंकज पराशर के पास कोई तैयार कहानी नहीं थी।
जब निर्माता ने पूछा कि श्रीदेवी के साथ किस तरह की फिल्म बनाना चाहते हैं, तो उन्होंने तुरंत कहा—“सीता और गीता।”

निर्माता ने श्रीदेवी से संपर्क किया और उनकी हामी मिल गई। लेकिन असली मजेदार किस्सा तब हुआ, जब पंकज पराशर की श्रीदेवी से पहली मुलाकात हुई।
श्रीदेवी ने उनसे सिर्फ इतना कहा—“बताओ।”
अब निर्देशक के सामने मुश्किल थी। ‘चालबाज़’ की स्क्रिप्ट तब तक लिखी ही नहीं गई थी। पंकज पराशर ने बिना घबराए ‘सीता और गीता’ की कहानी अपने अंदाज में श्रीदेवी को सुना दी।
कहानी सुनने के बाद श्रीदेवी ने फिल्म के लिए हां कर दी।
बाद में श्रीदेवी ने खुद पंकज पराशर को बताया कि उन्हें पता था कि कहानी ‘सीता और गीता’ की मूल अवधारणा पर आधारित है। वह जानबूझकर अनजान बनी रही थीं। उन्हें निर्देशक का आत्मविश्वास पसंद आया था।
इसके बाद चेन्नई में फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम शुरू हुआ। इसी दौरान कमल हासन ने पंकज पराशर को सलाह दी कि मूल कहानी की बुनियाद को बनाए रखते हुए उसमें अपना निर्देशक वाला अंदाज जरूर जोड़ें।

और फिर बनी ‘चालबाज़’—जहां श्रीदेवी ने अंजू और मंजू के डबल रोल में ऐसा जादू दिखाया कि दोनों किरदार आज भी दर्शकों की यादों में अलग-अलग बसे हुए हैं।
शूटिंग के शुरुआती दिनों में पंकज पराशर और श्रीदेवी के बीच ज्यादा बातचीत नहीं होती थी। लेकिन एक सीन का रफ कट देखने के बाद श्रीदेवी का नजरिया बदल गया। अगले दिन उनके घर से निर्देशक के लिए लंच आया और धीरे-धीरे दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई।
फिल्म रिलीज हुई तो श्रीदेवी के अभिनय की खूब तारीफ हुई और उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। सरोज खान को भी फिल्म की शानदार कोरियोग्राफी के लिए फिल्मफेयर सम्मान मिला।
आज का किस्सा, एक बड़ी सीख
‘चालबाज़’ की कहानी हमें बताती है कि सिनेमा में सिर्फ कहानी नहीं, उसे सुनाने का आत्मविश्वास भी मायने रखता है। पंकज पराशर के पास उस दिन पूरी स्क्रिप्ट नहीं थी, लेकिन उनके पास अपने विचार पर भरोसा जरूर था।
और श्रीदेवी?
वह सिर्फ कहानी सुनकर नहीं, कहानी सुनाने वाले के आत्मविश्वास को देखकर भी फैसला कर रही थीं।
13 अगस्त को श्रीदेवी के जन्मदिन पर उनकी याद में ‘चालबाज़’ का यह किस्सा आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे दिलचस्प किस्सों में शामिल है।