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मालवांचल मित्र, Entertainment Desk: Bhagwan Dada Death Anniversary | Bhagwan Abhaji Palav | Indian Cinema History भारतीय सिनेमा के पहले एक्शन हीरो कहे जाने वाले भगवान आभाजी पालव उर्फ़ भगवान दादा की आज पुण्यतिथि है। साइलेंट फ़िल्मों से शुरू हुआ करियरभगवान दादा का फ़िल्मी करियर साइलेंट फ़िल्मों के दौर में शुरू हुआ था। वे न सिर्फ़ अभिनेता थे, बल्कि स्टंट फ़िल्मों के निर्माता और निर्देशक भी थे। बेहद कम बजट में बनाई गई उनकी फ़िल्में उस समय मजदूर और आम वर्ग के बीच खासा लोकप्रिय थीं। भारत में एक्शन फ़िल्मों के जनकभारतीय फ़िल्मों में मुक्कों और हाथापाई वाली फ़ाइट का चलन भगवान दादा ने ही शुरू किया। उस दौर में उनकी तुलना हॉलीवुड स्टार डगलस फेयरबैंक्स से की जाने लगी और उन्हें “देसी डगलस फेयरबैंक्स” कहा गया। ललिता पवार हादसा और जीवनभर का पछतावाभगवान दादा की पहली टॉकी फ़िल्म “हिम्मत-ए-मर्दा” थी। इसी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक दृश्य में अभिनेत्री ललिता पवार की आंख गंभीर रूप से घायल हो गई, जिससे उनकी एक आंख हमेशा के लिए खराब हो गई। भारत की पहली हॉरर फ़िल्म का दावाकई फ़िल्म इतिहासकारों के अनुसार, भगवान दादा ने भारत की पहली हॉरर फ़िल्म “भेदी बंगला” का निर्माण किया था, जो बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। अलबेला ने बदली किस्मतफ़िल्म निर्माता राज कपूर की सलाह पर भगवान दादा ने स्टंट फ़िल्मों से हटकर सामाजिक फ़िल्म “अलबेला” बनाई। अलबेला सुपरहिट साबित हुई, जिसके गीत आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। यह फ़िल्म भगवान दादा ने दोस्तों से उधार लेकर बनाई थी, लेकिन सफलता के बाद उन पर दौलत की बारिश हो गई। शोहरत का शिखर: बंगला, कारें और स्टूडियोअलबेला की सफलता के बाद भगवान दादा ने चेंबूर में 25 कमरों का बंगला, सात अलग-अलग कारें खरीदीं। शेवरले उनकी पसंदीदा कार थी और उनके पास इसकी दो गाड़ियां थीं। पतन की शुरुआतअचानक मिली अपार सफलता ने भगवान दादा को अति-आत्मविश्वासी बना दिया। फिर लौटना पड़ा चॉल मेंआर्थिक संकट इतना बढ़ा कि बंगला और गाड़ियां बेचनी पड़ीं। संघर्षों में गुज़रा आख़िरी वक्तकभी भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार रहे भगवान दादा का अंतिम समय बेहद कठिन रहा। भारतीय सिनेमा का अनमोल अध्यायभगवान दादा ने भारतीय फ़िल्मों को एक्शन का नया रूप दिया। उनकी फ़िल्में, उनका संघर्ष और उनकी कहानी आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। मालवांचल मित्र भारत के पहले एक्शन हीरो को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। |
मालवांचल मित्र, Entertainment Desk: Bhagwan Dada Death Anniversary | Bhagwan Abhaji Palav | Indian Cinema History
भारतीय सिनेमा के पहले एक्शन हीरो कहे जाने वाले भगवान आभाजी पालव उर्फ़ भगवान दादा की आज पुण्यतिथि है।
04 फरवरी 2002 को इस महान कलाकार का निधन हुआ था। उनकी ज़िंदगी संघर्ष, सफलता, शोहरत और फिर पतन की ऐसी कहानी है, जो आज भी फ़िल्म जगत को सोचने पर मजबूर कर देती है।
भगवान दादा का फ़िल्मी करियर साइलेंट फ़िल्मों के दौर में शुरू हुआ था। वे न सिर्फ़ अभिनेता थे, बल्कि स्टंट फ़िल्मों के निर्माता और निर्देशक भी थे। बेहद कम बजट में बनाई गई उनकी फ़िल्में उस समय मजदूर और आम वर्ग के बीच खासा लोकप्रिय थीं।
भारतीय फ़िल्मों में मुक्कों और हाथापाई वाली फ़ाइट का चलन भगवान दादा ने ही शुरू किया। उस दौर में उनकी तुलना हॉलीवुड स्टार डगलस फेयरबैंक्स से की जाने लगी और उन्हें “देसी डगलस फेयरबैंक्स” कहा गया।
भगवान दादा की पहली टॉकी फ़िल्म “हिम्मत-ए-मर्दा” थी। इसी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक दृश्य में अभिनेत्री ललिता पवार की आंख गंभीर रूप से घायल हो गई, जिससे उनकी एक आंख हमेशा के लिए खराब हो गई।
इस हादसे को लेकर भगवान दादा जीवनभर दुखी और शर्मिंदा रहे।
कई फ़िल्म इतिहासकारों के अनुसार, भगवान दादा ने भारत की पहली हॉरर फ़िल्म “भेदी बंगला” का निर्माण किया था, जो बॉक्स ऑफिस पर सफल रही।
फ़िल्म निर्माता राज कपूर की सलाह पर भगवान दादा ने स्टंट फ़िल्मों से हटकर सामाजिक फ़िल्म “अलबेला” बनाई।
इस फ़िल्म में वे स्वयं हीरो बने और नायिका थीं गीता बाली।
अलबेला सुपरहिट साबित हुई, जिसके गीत आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं। यह फ़िल्म भगवान दादा ने दोस्तों से उधार लेकर बनाई थी, लेकिन सफलता के बाद उन पर दौलत की बारिश हो गई।
अलबेला की सफलता के बाद भगवान दादा ने चेंबूर में 25 कमरों का बंगला, सात अलग-अलग कारें खरीदीं। शेवरले उनकी पसंदीदा कार थी और उनके पास इसकी दो गाड़ियां थीं।
उन्होंने अपना खुद का फ़िल्म स्टूडियो “आशा स्टूडियोज़” भी स्थापित किया।
अचानक मिली अपार सफलता ने भगवान दादा को अति-आत्मविश्वासी बना दिया।
शराब, जुआ और ज़रूरत से ज़्यादा खर्च ने उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया। उनकी अगली कई फ़िल्में फ्लॉप रहीं और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा।
आर्थिक संकट इतना बढ़ा कि बंगला और गाड़ियां बेचनी पड़ीं।
भगवान दादा को फिर से दादर की उसी चॉल में लौटना पड़ा, जहां उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए।
कभी भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार रहे भगवान दादा का अंतिम समय बेहद कठिन रहा।
04 फरवरी 2002 को उनका निधन हो गया, लेकिन भारतीय फ़िल्म इतिहास में उनका योगदान अमर है।
भगवान दादा ने भारतीय फ़िल्मों को एक्शन का नया रूप दिया। उनकी फ़िल्में, उनका संघर्ष और उनकी कहानी आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
मालवांचल मित्र भारत के पहले एक्शन हीरो को श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
शत-शत नमन।