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मालवांचल मित्र, (ओमप्रकाश चौधरी): आज फिर वही समस्या सामने है, क्या लिखूं, किस पर लिखूं? कई दिनों की लगातार व्यस्तता ने शायद विचारों की जलधारा को रोक सा दिया है। फिर भी सोचा कुछ तो लिखूं तो लिखने लगा हूँ। हमारी संस्कृति में शब्द को ब्रम्ह कहा गया है। इसीलिए कहा जाता है, जो कुछ बोलो सोच समझकर बोलो या लिखो। क्योंकि अस्त्र-शस्त्र का घाव समय के साथ भर जाता है, लेकिन शब्दों का घाव मुश्किल से ही भरता है। वह नासूर बन कर रिसता रहता है। अंधों की औलाद अंधी होती है, द्रौपदी के इस एक वाक्य ने महाविनाशकारी महाभारत करवा दिया। हमारा दिल और दिमाग भी अजीब है—कभी-कभी हम कड़वी से कड़वी बात भी हँसी में उड़ा जाते हैं, तो कभी बहुत छोटी सी बात को दिल से लगा लेते हैं और वह हमारे बीच मनमुटाव का कारण बन जाती है। तब कहा जाता है कि बात न बात, नाम देखो कैसे लड़ पड़े, एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू हो गए। ऐसे अनुभवों को महसूस कर ही हमारे पूर्वजों ने शब्द को ब्रम्ह माना होगा, ताकि हम इन पवित्र शब्दों को सोच समझ कर बोलें या लिखें। बोले हुए शब्द तो फिर भी कुछ समय के बाद अनंत में विलीन हो जाते हैं या हमारी स्मृति से विलुप्त हो जाते हैं। लेकिन लिखे हुए शब्द तो प्रमाण होते हैं, उन्हें कभी झुठलाया नहीं जा सकता। इसीलिए महाजनी की भाषा में कहा जाता है—पेला लिख फिर दे, या सौ बकिया ने एक लिखिया। यही कारण है कि छोटे-बड़े हर समझौते या बात लिखित में होती है। कई बार उचित रीति से पंजीकृत न किया गया कोई लेख कानून की दृष्टि में महज कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। प्रौद्योगिकी के इस युग में तो बोले गए शब्द भी सुरक्षित रहते हैं और समय आने पर उन्हें बोलने वाले को बताया जा सकता है कि किस समय आपने क्या बोला था। हमारे बड़बोले और कुछ भी बोलने वाले नेताओं को यह प्रौद्योगिकी कई बार शर्मसार करती रहती है। पहले एक ज़माना था कि बोलने के बाद जब नेता की बात छाप जाती थी और विवाद बढ़ जाता था, तो नेता बड़ी मासूमियत से कह देते थे कि मेरी बात का गलत अर्थ लगाया गया है, उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। ऐसा नहीं है कि लिखी गई बातों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत नहीं किया जाता—यह काम भी आजकल बड़े पैमाने पर हो रहा है। किसी व्यक्ति या संगठन के बारे में बरसों पहले लिखी गई बात को आजकल दिखाने या प्रस्तुत करने का बड़ा शौक है। वह बात जिस संदर्भ में कही गई है, उसे संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करना आम है। नतीजा—लिखने वाले ने लिखा किसी और संदर्भ में था, पर उसे नया ही रंग देकर प्रस्तुत कर दिया जाता है। हमारे धर्म ग्रंथों में लिखी बातों के साथ कुछ धर्म विरोधी लोग यह खेल अक्सर खेलते रहते हैं। नतीजा—अनावश्यक विवाद पैदा होते हैं। बात शब्द की चली है तो शब्दों का अर्थ भी समय के साथ बदलता रहता है। कई शब्दों के अर्थ एक क्रिया विशेष के लिए रूढ़ हो गए हैं। किसी व्यक्ति ने कहा—अरे यार, आजकल मन बड़ा अशांत है। आपने सहानुभूति व्यक्त करते हुए यदि यह कह दिया कि भगवान आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे, तो हो सकता है सामने वाला बुरा मान जाए। शब्दों का यह मायाजाल भी अजब-गजब है। इसीलिए कहा गया है— किसी ज़माने का सम्मानजनक शब्द “गुरु” आज कई बार चालाक और धूर्त व्यक्ति के लिए प्रयोग होने लगा है—अरे वह बड़ा गुरु आदमी है। आज की राजनीति में अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता का अर्थ व्यक्ति से व्यक्ति के अनुसार बदल जाता है। अभिव्यक्ति की आजादी को ही ले लीजिए—हर राजनीतिक विचार के व्यक्ति के लिए इसका अर्थ अलग-अलग हो सकता है। एक बात एक पक्ष को अभिव्यक्ति की आजादी लगती है, तो दूसरे पक्ष को वह विवादास्पद लग सकती है। ऐसे उदाहरण और विवाद हमारे यहाँ आए दिन उछलते रहते हैं। यही हाल असहिष्णुता का है। देश के बहुसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति ने किसी अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति के लिए कुछ कह दिया या कुछ गलत कर दिया, तो उसे तत्काल असहिष्णुता बताकर आसमान सिर पर उठा लिया जाता है। लेकिन यही बात उलट जाए, तो उसे धार्मिक आजादी बताते देर नहीं लगती। यहाँ भी शब्द वही है, पर अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए उसके अर्थ अलग-अलग हैं। यही हाल धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता शब्दों का हुआ है। बहुसंख्यकों के हित या एकता की बात करना इस देश में साम्प्रदायिकता की सबसे प्रिय परिभाषा थी, और अल्पसंख्यकों के लिए बढ़-चढ़ कर बोलना धर्मनिरपेक्षता का पर्याय बना दिया गया था। परंतु समय का फेर देखिए—कुछ लीक पीटने वालों को छोड़ दीजिए, तो पिछले 10-11 सालों में इन शब्दों का प्रयोग करना लगभग बंद हो गया है, क्योंकि अब ये शब्द वोट बटोरने के हथियार के रूप में भोथरे हो गए हैं। आज वे लोग जिनके पुरखे जाति तोड़ो की बात करते थे, उनकी ज़ुबान पर आज जाति शब्द उठते-बैठते, सोते-जागते चढ़ा रहता है। एक तरफ समाज को जोड़ने की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ उसे जातियों में बांटने का दुश्चक्र चल रहा है। स्वार्थ वही राजनीतिक है। तो यह हाल है शब्दों का। शब्दों के अर्थ तो वही रहते हैं, किन्तु प्रयोग करने वाला अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसे तोड़ता-मरोड़ता रहता है। समय के साथ नए-नए शब्द खोजे जाते हैं, बनाए जाते हैं और उनके नवीन अर्थ भी निकाले जाते हैं, ताकि वह शब्द आज के अनुसार अपना अर्थ दे सके। यह है शब्द की ताकत। शब्द अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम है, इसलिए वह ब्रम्ह है। तो उसका सदुपयोग कीजिए। लिखिए जो अच्छा हो, सत्य हो और प्रिय हो, क्योंकि कहा गया है—“सत्यं वद, प्रियं वद।” जबकि हकीकत यह है कि सत्य हमेशा कड़वा ही होता है। |
मालवांचल मित्र, (ओमप्रकाश चौधरी):
आज फिर वही समस्या सामने है, क्या लिखूं, किस पर लिखूं? कई दिनों की लगातार व्यस्तता ने शायद विचारों की जलधारा को रोक सा दिया है। फिर भी सोचा कुछ तो लिखूं तो लिखने लगा हूँ।
हमारी संस्कृति में शब्द को ब्रम्ह कहा गया है। इसीलिए कहा जाता है, जो कुछ बोलो सोच समझकर बोलो या लिखो। क्योंकि अस्त्र-शस्त्र का घाव समय के साथ भर जाता है, लेकिन शब्दों का घाव मुश्किल से ही भरता है। वह नासूर बन कर रिसता रहता है।
अंधों की औलाद अंधी होती है, द्रौपदी के इस एक वाक्य ने महाविनाशकारी महाभारत करवा दिया। हमारा दिल और दिमाग भी अजीब है—कभी-कभी हम कड़वी से कड़वी बात भी हँसी में उड़ा जाते हैं, तो कभी बहुत छोटी सी बात को दिल से लगा लेते हैं और वह हमारे बीच मनमुटाव का कारण बन जाती है। तब कहा जाता है कि बात न बात, नाम देखो कैसे लड़ पड़े, एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू हो गए।
ऐसे अनुभवों को महसूस कर ही हमारे पूर्वजों ने शब्द को ब्रम्ह माना होगा, ताकि हम इन पवित्र शब्दों को सोच समझ कर बोलें या लिखें।
बोले हुए शब्द तो फिर भी कुछ समय के बाद अनंत में विलीन हो जाते हैं या हमारी स्मृति से विलुप्त हो जाते हैं। लेकिन लिखे हुए शब्द तो प्रमाण होते हैं, उन्हें कभी झुठलाया नहीं जा सकता। इसीलिए महाजनी की भाषा में कहा जाता है—पेला लिख फिर दे, या सौ बकिया ने एक लिखिया।
यही कारण है कि छोटे-बड़े हर समझौते या बात लिखित में होती है। कई बार उचित रीति से पंजीकृत न किया गया कोई लेख कानून की दृष्टि में महज कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है।
प्रौद्योगिकी के इस युग में तो बोले गए शब्द भी सुरक्षित रहते हैं और समय आने पर उन्हें बोलने वाले को बताया जा सकता है कि किस समय आपने क्या बोला था। हमारे बड़बोले और कुछ भी बोलने वाले नेताओं को यह प्रौद्योगिकी कई बार शर्मसार करती रहती है।
पहले एक ज़माना था कि बोलने के बाद जब नेता की बात छाप जाती थी और विवाद बढ़ जाता था, तो नेता बड़ी मासूमियत से कह देते थे कि मेरी बात का गलत अर्थ लगाया गया है, उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। ऐसा नहीं है कि लिखी गई बातों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत नहीं किया जाता—यह काम भी आजकल बड़े पैमाने पर हो रहा है।
किसी व्यक्ति या संगठन के बारे में बरसों पहले लिखी गई बात को आजकल दिखाने या प्रस्तुत करने का बड़ा शौक है। वह बात जिस संदर्भ में कही गई है, उसे संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करना आम है। नतीजा—लिखने वाले ने लिखा किसी और संदर्भ में था, पर उसे नया ही रंग देकर प्रस्तुत कर दिया जाता है।
हमारे धर्म ग्रंथों में लिखी बातों के साथ कुछ धर्म विरोधी लोग यह खेल अक्सर खेलते रहते हैं। नतीजा—अनावश्यक विवाद पैदा होते हैं।
बात शब्द की चली है तो शब्दों का अर्थ भी समय के साथ बदलता रहता है। कई शब्दों के अर्थ एक क्रिया विशेष के लिए रूढ़ हो गए हैं। किसी व्यक्ति ने कहा—अरे यार, आजकल मन बड़ा अशांत है। आपने सहानुभूति व्यक्त करते हुए यदि यह कह दिया कि भगवान आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे, तो हो सकता है सामने वाला बुरा मान जाए।
शब्दों का यह मायाजाल भी अजब-गजब है। इसीलिए कहा गया है—
“बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पाँव।”
किसी ज़माने का सम्मानजनक शब्द “गुरु” आज कई बार चालाक और धूर्त व्यक्ति के लिए प्रयोग होने लगा है—अरे वह बड़ा गुरु आदमी है।
आज की राजनीति में अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता का अर्थ व्यक्ति से व्यक्ति के अनुसार बदल जाता है। अभिव्यक्ति की आजादी को ही ले लीजिए—हर राजनीतिक विचार के व्यक्ति के लिए इसका अर्थ अलग-अलग हो सकता है। एक बात एक पक्ष को अभिव्यक्ति की आजादी लगती है, तो दूसरे पक्ष को वह विवादास्पद लग सकती है। ऐसे उदाहरण और विवाद हमारे यहाँ आए दिन उछलते रहते हैं।
यही हाल असहिष्णुता का है। देश के बहुसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति ने किसी अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति के लिए कुछ कह दिया या कुछ गलत कर दिया, तो उसे तत्काल असहिष्णुता बताकर आसमान सिर पर उठा लिया जाता है। लेकिन यही बात उलट जाए, तो उसे धार्मिक आजादी बताते देर नहीं लगती। यहाँ भी शब्द वही है, पर अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए उसके अर्थ अलग-अलग हैं।
यही हाल धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता शब्दों का हुआ है। बहुसंख्यकों के हित या एकता की बात करना इस देश में साम्प्रदायिकता की सबसे प्रिय परिभाषा थी, और अल्पसंख्यकों के लिए बढ़-चढ़ कर बोलना धर्मनिरपेक्षता का पर्याय बना दिया गया था।
परंतु समय का फेर देखिए—कुछ लीक पीटने वालों को छोड़ दीजिए, तो पिछले 10-11 सालों में इन शब्दों का प्रयोग करना लगभग बंद हो गया है, क्योंकि अब ये शब्द वोट बटोरने के हथियार के रूप में भोथरे हो गए हैं।
आज वे लोग जिनके पुरखे जाति तोड़ो की बात करते थे, उनकी ज़ुबान पर आज जाति शब्द उठते-बैठते, सोते-जागते चढ़ा रहता है। एक तरफ समाज को जोड़ने की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ उसे जातियों में बांटने का दुश्चक्र चल रहा है। स्वार्थ वही राजनीतिक है।
तो यह हाल है शब्दों का। शब्दों के अर्थ तो वही रहते हैं, किन्तु प्रयोग करने वाला अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसे तोड़ता-मरोड़ता रहता है। समय के साथ नए-नए शब्द खोजे जाते हैं, बनाए जाते हैं और उनके नवीन अर्थ भी निकाले जाते हैं, ताकि वह शब्द आज के अनुसार अपना अर्थ दे सके।
यह है शब्द की ताकत। शब्द अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम है, इसलिए वह ब्रम्ह है। तो उसका सदुपयोग कीजिए। लिखिए जो अच्छा हो, सत्य हो और प्रिय हो, क्योंकि कहा गया है—“सत्यं वद, प्रियं वद।”
जबकि हकीकत यह है कि सत्य हमेशा कड़वा ही होता है।