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अहमदाबाद से नीमच आ रही बस में यात्रियों की परेशानी, महिलाओं, बच्चों और इलाज कराकर लौट रहे मरीजों को भी भुगतनी पड़ी अव्यवस्था नीमच। मालवांचल मित्र त्योहार का मौसम हो, बसों में भीड़ हो और किराया भी जेब के हिसाब से नहीं बल्कि मौके के हिसाब से तय होने लगे, तब यात्री आखिर शिकायत किससे करें? नीमच आने वाली एक बस में यात्रियों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जहां उन्हें नीमच पहुंचाने के बजाय सुबह करीब 4 बजे निम्बाहेड़ा उतार दिया गया। मामला जय श्री गणेश ट्रेवल्स की बस क्रमांक MP 44 ZC 9981 का बताया जा रहा है, जो अहमदाबाद से नीमच आ रही थी। यात्रियों के अनुसार बस में महिलाएं, बच्चे और इलाज करवाकर लौट रहे मरीज भी सवार थे। ऐसे में रात के अंतिम पहर किसी यात्री को उसके गंतव्य से पहले दूसरे शहर में उतार देना परेशानी को कई गुना बढ़ा देता है। कहा गया- बस बायपास से जाएगी, पीछे से आने वाली बस में बैठा देंगेयात्रियों का कहना है कि उन्हें निम्बाहेड़ा में उतारते समय बताया गया कि बस बायपास से रामपुरा की ओर जाएगी और पीछे से आ रही एलके बस में यात्रियों को शिफ्ट कर दिया जाएगा। यात्रियों को शायद लगा होगा कि थोड़ी देर की बात है और दूसरी बस आ जाएगी। लेकिन इंतजार करीब 40 मिनट तक चला। इसके बाद यात्रियों को खड़े होकर सफर करने की मजबूरी बनी। सोचिए, रात के चार बजे का समय, साथ में महिलाएं और बच्चे, कोई इलाज करवाकर लौट रहा है और ऊपर से बैठने की जगह भी नहीं। बस सेवा में सुविधा का वादा अलग और जमीन पर यात्रियों का अनुभव अलग—यही अंतर इस पूरे मामले को सवालों के घेरे में खड़ा करता है।
बस में टॉयलेट था, लेकिन बंद मिला यात्रियों ने बस की सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बस में टॉयलेट की व्यवस्था होने की बात कही गई थी, लेकिन जरूरत के समय वह बंद मिला। इतना ही नहीं, यात्रियों ने बस में प्रकाश व्यवस्था को लेकर भी शिकायत की। रात के सफर में पर्याप्त रोशनी नहीं होने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। किराया बढ़ा तो सुविधाएं भी बढ़नी चाहिए या सिर्फ बिल? यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब राज्य सरकार द्वारा बस किराए में बढ़ोतरी की खबरें भी चर्चा में हैं। यात्रियों का आरोप है कि सरकार ने जिस अनुपात में किराया बढ़ाया है, उससे कई गुना ज्यादा किराया त्योहार के मौसम को देखते हुए वसूला जा रहा है। यात्रियों का सीधा सवाल है—अगर किराया बढ़ रहा है तो क्या उसके साथ यात्री सुविधा और जवाबदेही भी बढ़ेगी या फिर बढ़ोतरी का मतलब सिर्फ टिकट की कीमत बढ़ना है? यात्रियों ने यह भी आरोप लगाया कि निजी बस संचालकों पर सरकारी नियंत्रण प्रभावी नजर नहीं आता। यदि यह शिकायत सही है तो परिवहन विभाग के लिए यह जांच का विषय होना चाहिए कि यात्रियों से कितना किराया लिया गया, टिकट पर क्या राशि दर्ज थी और यात्रियों को उनके निर्धारित गंतव्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी।
त्योहार में बसों की मनमानी पर सवाल त्योहारों के दौरान यात्रियों की संख्या बढ़ना कोई नई बात नहीं है। यह भी तय है कि भीड़ के समय बसों पर दबाव बढ़ता है। लेकिन यात्री का टिकट सिर्फ सीट के लिए नहीं होता, वह अपने निर्धारित गंतव्य तक सुरक्षित और व्यवस्थित पहुंचने की उम्मीद के साथ किराया देता है। नीमच जाने वाले यात्रियों को निम्बाहेड़ा उतार देना, फिर दूसरी बस का इंतजार करवाना और उसके बाद खड़े होकर सफर करवाना सामान्य यात्री सुविधा की श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता। अब सवाल जय श्री गणेश ट्रेवल्स से ज्यादा परिवहन विभाग से है—क्या इस मामले की जांच होगी? त्योहार के नाम पर अतिरिक्त किराया वसूली की शिकायतों की पड़ताल होगी? और क्या निजी बस संचालकों को यह याद दिलाया जाएगा कि यात्री ग्राहक ही नहीं, जिम्मेदारी भी है? किराया बढ़ाने का अधिकार अगर नियमों के तहत है, तो सुविधा और जवाबदेही भी उसी अनुपात में दिखाई देनी चाहिए। वरना स्थिति यही रहेगी—टिकट नीमच का, सफर निम्बाहेड़ा तक और आगे की व्यवस्था यात्रियों की किस्मत के भरोसे।
नोट: खबर में उल्लेखित अव्यवस्थाएं यात्रियों द्वारा बताए गए अनुभव और आरोपों पर आधारित हैं। संबंधित बस संचालक या परिवहन विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जा सकता है। |
अहमदाबाद से नीमच आ रही बस में यात्रियों की परेशानी, महिलाओं, बच्चों और इलाज कराकर लौट रहे मरीजों को भी भुगतनी पड़ी अव्यवस्था
नीमच। मालवांचल मित्र
त्योहार का मौसम हो, बसों में भीड़ हो और किराया भी जेब के हिसाब से नहीं बल्कि मौके के हिसाब से तय होने लगे, तब यात्री आखिर शिकायत किससे करें? नीमच आने वाली एक बस में यात्रियों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जहां उन्हें नीमच पहुंचाने के बजाय सुबह करीब 4 बजे निम्बाहेड़ा उतार दिया गया।
मामला जय श्री गणेश ट्रेवल्स की बस क्रमांक MP 44 ZC 9981 का बताया जा रहा है, जो अहमदाबाद से नीमच आ रही थी। यात्रियों के अनुसार बस में महिलाएं, बच्चे और इलाज करवाकर लौट रहे मरीज भी सवार थे। ऐसे में रात के अंतिम पहर किसी यात्री को उसके गंतव्य से पहले दूसरे शहर में उतार देना परेशानी को कई गुना बढ़ा देता है।
यात्रियों का कहना है कि उन्हें निम्बाहेड़ा में उतारते समय बताया गया कि बस बायपास से रामपुरा की ओर जाएगी और पीछे से आ रही एलके बस में यात्रियों को शिफ्ट कर दिया जाएगा।
यात्रियों को शायद लगा होगा कि थोड़ी देर की बात है और दूसरी बस आ जाएगी। लेकिन इंतजार करीब 40 मिनट तक चला। इसके बाद यात्रियों को खड़े होकर सफर करने की मजबूरी बनी।
सोचिए, रात के चार बजे का समय, साथ में महिलाएं और बच्चे, कोई इलाज करवाकर लौट रहा है और ऊपर से बैठने की जगह भी नहीं। बस सेवा में सुविधा का वादा अलग और जमीन पर यात्रियों का अनुभव अलग—यही अंतर इस पूरे मामले को सवालों के घेरे में खड़ा करता है।

बस में टॉयलेट था, लेकिन बंद मिला
यात्रियों ने बस की सुविधाओं को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बस में टॉयलेट की व्यवस्था होने की बात कही गई थी, लेकिन जरूरत के समय वह बंद मिला।
इतना ही नहीं, यात्रियों ने बस में प्रकाश व्यवस्था को लेकर भी शिकायत की। रात के सफर में पर्याप्त रोशनी नहीं होने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा।
किराया बढ़ा तो सुविधाएं भी बढ़नी चाहिए या सिर्फ बिल?
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब राज्य सरकार द्वारा बस किराए में बढ़ोतरी की खबरें भी चर्चा में हैं। यात्रियों का आरोप है कि सरकार ने जिस अनुपात में किराया बढ़ाया है, उससे कई गुना ज्यादा किराया त्योहार के मौसम को देखते हुए वसूला जा रहा है।
यात्रियों का सीधा सवाल है—अगर किराया बढ़ रहा है तो क्या उसके साथ यात्री सुविधा और जवाबदेही भी बढ़ेगी या फिर बढ़ोतरी का मतलब सिर्फ टिकट की कीमत बढ़ना है?
यात्रियों ने यह भी आरोप लगाया कि निजी बस संचालकों पर सरकारी नियंत्रण प्रभावी नजर नहीं आता। यदि यह शिकायत सही है तो परिवहन विभाग के लिए यह जांच का विषय होना चाहिए कि यात्रियों से कितना किराया लिया गया, टिकट पर क्या राशि दर्ज थी और यात्रियों को उनके निर्धारित गंतव्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी।

त्योहार में बसों की मनमानी पर सवाल
त्योहारों के दौरान यात्रियों की संख्या बढ़ना कोई नई बात नहीं है। यह भी तय है कि भीड़ के समय बसों पर दबाव बढ़ता है। लेकिन यात्री का टिकट सिर्फ सीट के लिए नहीं होता, वह अपने निर्धारित गंतव्य तक सुरक्षित और व्यवस्थित पहुंचने की उम्मीद के साथ किराया देता है।
नीमच जाने वाले यात्रियों को निम्बाहेड़ा उतार देना, फिर दूसरी बस का इंतजार करवाना और उसके बाद खड़े होकर सफर करवाना सामान्य यात्री सुविधा की श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता।
अब सवाल जय श्री गणेश ट्रेवल्स से ज्यादा परिवहन विभाग से है—क्या इस मामले की जांच होगी? त्योहार के नाम पर अतिरिक्त किराया वसूली की शिकायतों की पड़ताल होगी? और क्या निजी बस संचालकों को यह याद दिलाया जाएगा कि यात्री ग्राहक ही नहीं, जिम्मेदारी भी है?
किराया बढ़ाने का अधिकार अगर नियमों के तहत है, तो सुविधा और जवाबदेही भी उसी अनुपात में दिखाई देनी चाहिए। वरना स्थिति यही रहेगी—टिकट नीमच का, सफर निम्बाहेड़ा तक और आगे की व्यवस्था यात्रियों की किस्मत के भरोसे।
नोट: खबर में उल्लेखित अव्यवस्थाएं यात्रियों द्वारा बताए गए अनुभव और आरोपों पर आधारित हैं। संबंधित बस संचालक या परिवहन विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जा सकता है।