मालवांचल मित्र, नीमच: पूरा विश्व खाड़ी युद्ध और उससे उपजे ईंधन संकट की चपेट में है। चारों तरफ ईंधन के भाव बढ़ रहे हैं । हमारे देश की जनता भी यह मानकर चल रही थी कि तेल और गैस के भाव बढ़ेंगे ही। सरकार ने शुरुआत में गैस के दाम बढ़ा भी दिए । हमारे देश का विपक्ष आपदा में अवसर की तरह उत्साहित था कि अब मोदी फंसा तेल गैस के भाव बढाना ही पड़ेंगे और ऐसा हुआ तो बस हमारी उड़ के लगी समझो।
लेकिन हाय री किस्मत भाव बढ़े भी उस पेट्रोल डीजल के जिससे आम आदमी का कोई संबंध नही। गैस के दाम बढ़े भी तो जनता में कहीं कोई गुस्सा दिख नही रहा। अब बेचारे करें भी तो क्या? तब फिर नया खेल रचकर गैस की कमी का हव्वा खड़ा किया गया । पेट्रोल डीजल के खत्म होने की आवाज लगाकर पेट्रोल पंपों पर लाइन लगवा दी। पर दो दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत की तरह यह हाय तौबा भी समुद्र में पानी की एक बून्द ही साबित हुई। लोग शुरू में तो झांसे में आ गये पर जल्दी ही उन्हें सारा खेल समझ मे आ गया।अब वे न गैस एजंसी की तरफ झांक रहे हैं न पेट्रोल पंप की तरफ । और वे बेचारे जो इस युद्ध की आड़ में बिल्ली के भाग से छींका टूटने की उम्मीद पाले बैठे थे उनकी उम्मीद पर फिर पाला पड़ गया।
ईरान इजराइल,अमेरिका युद्ध में ट्रम्प से ज्यादा परेशान या तो हमारा विपक्ष या फिर हमारा पड़ोसी। और मजे की बात दोनो के सुर एक जैसे। पड़ोसी इस युद्ध मे मध्यस्थता या यूं कहिये दलाली करने के लिए मरा जा रहा है ताकि कमीशन की थोड़ी बहुत मलाई तो छोड़िये छाछ ही मिल जाए। उसके नेता इस चक्कर में इधर से उधर दौड़ते फिर रहे हैं । पड़ोसी की उछल कूद पर हमारे देश का विपक्ष उसकी शान में कसीदे पढ़ने में लगा है। वो देखो हमारा पड़ोसी युद्ध बन्द कराने में मध्यस्थ बन गया और हमारे नेता मुंह ताकते रह गए। लगा कि यह फुग्गा फूलेगा लेकिन एन वक्त पर विदेश मंत्री ने यह कहकर हवा निकाल दी कि हम पड़ोसी की तरह से दलाल नही है। अब विपक्ष की हालत फिर वही धोबी के कुत्ते के जैसी हो गई न घर के रहे न घाट के।
लेकिन बाबा तुलसीदास कह गए हैं कि कौतुक करने वालों के लिए तमाशे की कोई कमी नही है । क्योंकि जबसे यह युद्ध शुरू हुआ है तब से खुद को दुनिया का ठेकेदार समझने वाले ट्रम्प साहब और उनके चेले रोज नित नए ऊंटपटांग बयान देते रहते हैं । उनका ऐसा ही बयान आया कि भारत रूस से तेल खरीद सकता है या ईरान के तेल बेचने पर से प्रतिबंध हमने हटा लिया है। अब यह बयान क्या आया हमारे विपक्ष के लोग फिर उछलने लगे। अरे देखो हमारी सरकार अमेरिका के आगे नतमस्तक हो गई वह उसके इशारों पर चल रही है और फिर वही नरेंदर सरेंडर का जुमला उछालने लग गए। पर मजे की बात यह कि हमारे देश के नेतृत्व ने इस सारे ध्वनि प्रदूषण पर एक शब्द नही कहा। वह चुपचाप अपना काम करती रही और नतीजा कभी फंसे हुए गैस और तेल के टैंकर भारत आने लगे तो कभी रूस से तो कभी ऑस्ट्रेलिया या फिर कभी किसी अन्य देश से तेल और गैस आने लग गयी। नतीजा वे लोग जो कमी होने के मंसूबा पाले थे उनकी उम्मीदें फिर टूट गयी। पर उन्होंने हिम्मत नही हारी वे अपने प्रचार या दुष्प्रचार में लगे रहे ,लेकिन जनता उसके कान पर जूं तक नही रेंगी । क्योंकि उसे तो केवल इस बात से मतलब है कि देश मे पेट्रोल, डीजल और गैस आसानी से मिलती रही । ये सब किस देश से और कैसे आ रहा है उससे उसे कोई मतलब नही । हमारी जनता केवल आम खाना जानती है पेड़ गिनने का काम उसने देश के विपक्ष को थमा रखा है। बल्कि इस संकट के समय वह अपने देश और उसकी सरकार के साथ खड़ी है वह भी कमर कसकर फिर चाहे तेल गैस के दाम क्यों न बढ़ जाएं? क्योंकि इस सारे संकट की सच्चाई और देश के नेता की नीयत और काम पर उसे भरोसा है। जब अपने नेता पर दृढ़ विश्वास हो तो देश विरोधियों की चिल्लपों पर कौन ध्यान दे? यह हैं इस खाड़ी युद्ध के कुछ साइड इफेक्ट । जिसके कारण विश्व के अधिकाँश देश और देश का विपक्ष हैरान परेशान है पर देश की जनता चैन की बंसी बजा रही क्योंकि उसे अपने नेता और सरकार की योग्यता और क्षमता पर पूरा विश्वास है। तो देखते रहिए नित नए बकझक के नित नए उड़ते और बेकार होते तीर ।आरोपों के तरकश खाली होते रहेंगे और वार खाली जाते रहेंगे।
एक विचार यह भी : खाड़ी युद्ध के साइड इफेक्ट - ओमप्रकाश चौधरी
मालवांचल मित्र, नीमच: पूरा विश्व खाड़ी युद्ध और उससे उपजे ईंधन संकट की चपेट में है। चारों तरफ ईंधन के भाव बढ़ रहे हैं । हमारे देश की जनता भी यह मानकर चल रही थी कि तेल और गैस के भाव बढ़ेंगे ही। सरकार ने शुरुआत में गैस के दाम बढ़ा भी दिए । हमारे देश का विपक्ष आपदा में अवसर की तरह उत्साहित था कि अब मोदी फंसा तेल गैस के भाव बढाना ही पड़ेंगे और ऐसा हुआ तो बस हमारी उड़ के लगी समझो।
लेकिन हाय री किस्मत भाव बढ़े भी उस पेट्रोल डीजल के जिससे आम आदमी का कोई संबंध नही। गैस के दाम बढ़े भी तो जनता में कहीं कोई गुस्सा दिख नही रहा। अब बेचारे करें भी तो क्या? तब फिर नया खेल रचकर गैस की कमी का हव्वा खड़ा किया गया । पेट्रोल डीजल के खत्म होने की आवाज लगाकर पेट्रोल पंपों पर लाइन लगवा दी। पर दो दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत की तरह यह हाय तौबा भी समुद्र में पानी की एक बून्द ही साबित हुई। लोग शुरू में तो झांसे में आ गये पर जल्दी ही उन्हें सारा खेल समझ मे आ गया।अब वे न गैस एजंसी की तरफ झांक रहे हैं न पेट्रोल पंप की तरफ । और वे बेचारे जो इस युद्ध की आड़ में बिल्ली के भाग से छींका टूटने की उम्मीद पाले बैठे थे उनकी उम्मीद पर फिर पाला पड़ गया।
ईरान इजराइल,अमेरिका युद्ध में ट्रम्प से ज्यादा परेशान या तो हमारा विपक्ष या फिर हमारा पड़ोसी। और मजे की बात दोनो के सुर एक जैसे। पड़ोसी इस युद्ध मे मध्यस्थता या यूं कहिये दलाली करने के लिए मरा जा रहा है ताकि कमीशन की थोड़ी बहुत मलाई तो छोड़िये छाछ ही मिल जाए। उसके नेता इस चक्कर में इधर से उधर दौड़ते फिर रहे हैं । पड़ोसी की उछल कूद पर हमारे देश का विपक्ष उसकी शान में कसीदे पढ़ने में लगा है। वो देखो हमारा पड़ोसी युद्ध बन्द कराने में मध्यस्थ बन गया और हमारे नेता मुंह ताकते रह गए। लगा कि यह फुग्गा फूलेगा लेकिन एन वक्त पर विदेश मंत्री ने यह कहकर हवा निकाल दी कि हम पड़ोसी की तरह से दलाल नही है। अब विपक्ष की हालत फिर वही धोबी के कुत्ते के जैसी हो गई न घर के रहे न घाट के।
लेकिन बाबा तुलसीदास कह गए हैं कि कौतुक करने वालों के लिए तमाशे की कोई कमी नही है । क्योंकि जबसे यह युद्ध शुरू हुआ है तब से खुद को दुनिया का ठेकेदार समझने वाले ट्रम्प साहब और उनके चेले रोज नित नए ऊंटपटांग बयान देते रहते हैं । उनका ऐसा ही बयान आया कि भारत रूस से तेल खरीद सकता है या ईरान के तेल बेचने पर से प्रतिबंध हमने हटा लिया है। अब यह बयान क्या आया हमारे विपक्ष के लोग फिर उछलने लगे। अरे देखो हमारी सरकार अमेरिका के आगे नतमस्तक हो गई वह उसके इशारों पर चल रही है और फिर वही नरेंदर सरेंडर का जुमला उछालने लग गए। पर मजे की बात यह कि हमारे देश के नेतृत्व ने इस सारे ध्वनि प्रदूषण पर एक शब्द नही कहा। वह चुपचाप अपना काम करती रही और नतीजा कभी फंसे हुए गैस और तेल के टैंकर भारत आने लगे तो कभी रूस से तो कभी ऑस्ट्रेलिया या फिर कभी किसी अन्य देश से तेल और गैस आने लग गयी। नतीजा वे लोग जो कमी होने के मंसूबा पाले थे उनकी उम्मीदें फिर टूट गयी। पर उन्होंने हिम्मत नही हारी वे अपने प्रचार या दुष्प्रचार में लगे रहे ,लेकिन जनता उसके कान पर जूं तक नही रेंगी । क्योंकि उसे तो केवल इस बात से मतलब है कि देश मे पेट्रोल, डीजल और गैस आसानी से मिलती रही । ये सब किस देश से और कैसे आ रहा है उससे उसे कोई मतलब नही । हमारी जनता केवल आम खाना जानती है पेड़ गिनने का काम उसने देश के विपक्ष को थमा रखा है। बल्कि इस संकट के समय वह अपने देश और उसकी सरकार के साथ खड़ी है वह भी कमर कसकर फिर चाहे तेल गैस के दाम क्यों न बढ़ जाएं? क्योंकि इस सारे संकट की सच्चाई और देश के नेता की नीयत और काम पर उसे भरोसा है। जब अपने नेता पर दृढ़ विश्वास हो तो देश विरोधियों की चिल्लपों पर कौन ध्यान दे? यह हैं इस खाड़ी युद्ध के कुछ साइड इफेक्ट । जिसके कारण विश्व के अधिकाँश देश और देश का विपक्ष हैरान परेशान है पर देश की जनता चैन की बंसी बजा रही क्योंकि उसे अपने नेता और सरकार की योग्यता और क्षमता पर पूरा विश्वास है। तो देखते रहिए नित नए बकझक के नित नए उड़ते और बेकार होते तीर ।आरोपों के तरकश खाली होते रहेंगे और वार खाली जाते रहेंगे।