मालवांचल मित्र, (ओमप्रकाश चौधरी): राजनीति में नेता और उनके बयान दोनों का चोली दामन का साथ है। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। नेता है तो बोलेगा ही, जो न बोले उसे लोग नेता मानते ही नहीं। इसी कारण हमारे एक प्रधानमंत्रीजी को लोग मोनी बाबा कहने लगे थे।
हमारे देश की राजनीति में ऐसे भी नेता हुए हैं जिनके बोल शुद्ध मनोरंजन हुआ करते थे। इनमें से एक तो दिवंगत हो गए और दूसरे आजकल ज्यादा बोल नहीं पाते क्योंकि उनकी जगह अब उनके बेटे बोलने लगे हैं। हर नेता का बोलने का अपना अंदाज होता है।
दिवंगत नेताजी का भी एक किस्सा मशहूर है। प्रधानमंत्री विदेश यात्रा से लौटे तो वे भी पंहुच गए स्वागत करने। उन्होंने इत्र का छिड़काव किया तो प्रधानमंत्रीजी बोले—मेरे सामने तो इत्र लगा रहे हो लेकिन मेरी अनुपस्थिति में शब्दों से दुर्गन्ध फैलाते हो। अब नेताजी क्या कहते, बात तो सच थी।
एक और प्रधानमंत्रीजी ने जब पड़ोसी देश द्वारा जमीन कब्जाने पर संसद में कहा कि वह जमीन तो बंजर है, उस पर घास का एक तिनका भी नहीं उगता। तो एक सांसद जी ने खड़े होकर कहा कि आपके और मेरे सर पर भी अब एक बाल नहीं उगता, तो क्या इन्हें भी पड़ोसी देश को दे दें? व्यंग बड़ा तीखा था, वापस कोई जवाब नहीं आया।
नेताओं के बोल के एक और किस्से पर गौर कीजिए। बड़े विपक्षी नेता हैं, पूरी ताकत लगाकर पार्टी को सत्ता के पास पहुंचा दिया लेकिन सबसे बड़ी कुर्सी तक कभी नहीं पहुंच पाए। वे पड़ोसी देश की यात्रा पर गए और वहां उस देश के संस्थापक की मजार पर जाकर कह आए कि वे तो बड़े सेकुलर थे। बस उनके वापस आने से पहले ही पार्टी में कोहराम मच गया। पार्टी की अध्यक्षी चली गई और वे केवल भूतपूर्व बनकर रह गए।
खैर, यह वह दौर था जब हमारे नेता गाहे-बगाहे ही जबान की फिसलन के शिकार होते थे। जब भी बोलते थे सोच-समझकर बोलते थे और उनके बोलने को सत्ता हो या विपक्ष, सब बड़े ध्यान से सुनते थे। वे आरोप भी लगाते थे तो पूरी प्रामाणिकता के साथ, आज की तरह नहीं कि मनगढ़ंत कुछ भी आरोप लगाओ और भाग जाओ।
जब आरोप गले पड़ जाए तो पूरी निर्लज्जता से माफी मांग लो और अगले दिन फिर वही झूठ बोलना शुरू। देश की राजनीति में यह चलन पहले बहुत कम था, पर इसे राजनीति का हथियार बनाया अफसर से नेता बने एक पूर्व मुख्यमंत्री ने। उन्होंने झूठे आरोप लगाने में नए-नए कीर्तिमान स्थापित किए और जब फंस गए तो माफी भी मांग ली। एक-दो मामले तो अभी भी चल ही रहे हैं, देखें उनमें माफी कब मांगते हैं।
उनका अनुसरण यूं तो कई नेताओं ने किया, परन्तु खुद को पैदाइशी पीएम मानने वाले सदाबहार युवा नेता तो उनसे भी आगे निकल गए। मैं किसी से डरता नहीं, मैं फलां नहीं हूँ जो माफी मांग लूंगा, लेकिन जैसे ही कानून का हथौड़ा पड़ा, लग गए माफी मांगने। रही बात झूठ बोलने की, तो आजकल तो इसमें भी नित नए कीर्तिमान बना रहे हैं।
वोटिंग मशीन से लेकर चुनाव आयोग, किसी को नहीं छोड़ा। यहां तक कि एक दिवंगत नेता पर खुद को मरने के बाद धमकाने का आरोप लगाने से नहीं चूके। कभी वोट बढ़ाकर, कभी चुराकर जीतने का आरोप लगाते हैं। आजकल वोट कटवाने का आरोप लगाते घूम रहे हैं। और जिस पर आरोप लगा रहे हैं, वह बुलाता है कि आओ और साबित करो, तो उधर का मुंह नहीं करते।
एक और हैं जो एक प्रदेश की बची-खुची पार्टी के अध्यक्षजी के नाक के बाल हैं। उन्होंने तो हद ही कर दी। जिस हत्याकांड ने पड़ोसी देश की बैंड बजा दी, उसके तथ्यों को ही झुठला दिया और यहां तक कह गए कि यह बात मुझे जो मर गए उनके परिजनों ने बताई। और ये जो कुछ कहा जा रहा है, सब शासक पार्टी की साजिश थी दंगा कराने की।
अब जैसे ही उनके ये बोल फूटे, उनके ही शहर के दो पीड़ितों के रिश्तेदारों ने कहा—नेताजी झूठ बोल रहे हैं, ये या उनका कोई छुटभैया नेता तक हमसे मिलने नहीं आया। लेकिन नेताजी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। वे लग गए होंगे किसी नए झूठ को बोलने की तैयारी में।
देश के पूर्व गृह मंत्री हैं और एक उनके साथी हैं जो चुनाव जीतने के लिए पड़ोसी देश की मदद तक मांग चुके हैं। उनको आजकल दुश्मन देश पर लगे आरोपों की बड़ी चिंता हो रही है। उन्हें उम्मीद रही होगी कि आतंकवादी हत्याकांड के बाद आज की सरकार भी उनकी सरकार की तरह आरोपों के डोजियर का पुलंदा पड़ोसी देश को भेजेगी।
पर सरकार और सेना ने कागजों का नहीं, मिसाइलों का डोजियर ही भेज दिया। अब ये कह रहे हैं—आपने यह तो साबित किया ही नहीं कि इस हत्याकांड में पड़ोसी का हाथ था। और अब पड़ोसी उनके इसी बयान को सर्टिफिकेट की तरह लेकर घूम रहा है। लेकिन इन्हें अपने झूठ पर कोई शर्म नहीं है।
पिछली लोकसभा में एक और थे, जो अपनी पार्टी के लोकसभा में नेता थे। वे आए दिन कुछ भी उलटा-सीधा बोल देते और जब सर पर पड़ती, तो बड़ी मासूमियत से अपनी जबान फिसलने का ठीकरा हिंदी ठीक से न बोल और समझ पाने पर फोड़ देते।
राष्ट्रीय तो छोड़िए, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खुद को महाशक्ति बताने वाले देश के महान नेता शांति का मसीहा बनने के चक्कर में रोज नए-नए झूठ बोल रहे हैं, धमकी दे रहे हैं। और उनके इन झूठे बयानों को हमारे देश के कुछ नेता हाथों-हाथ ले रहे हैं, क्योंकि इन्हें भी अपने यहां झूठ की राजनीति करने में महारत हासिल हो गई है।
अब हाल यह हो गया है कि महाशक्ति के उन महान नेता को उनके अपने देश में और अन्य देशों में कोई गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है, क्योंकि वे कब क्या कह जाएं, करने लग जाएं, कोई भरोसा नहीं। लेकिन हमारे देश में कुछ लोग उन्हें सर माथे पर बिठाए घूम रहे हैं।
अब पता नहीं यह झूठ और बचकाने बोलों पर आधारित राजनीति कब तक चलेगी। इससे और कुछ हो या न हो, जनता का मनोरंजन जरूर हो रहा है और ये हंसी का पात्र बन रहे हैं।
जो यह झूठ की राजनीति चला रहे हैं, वे फिर जब धड़ाम से गिरेंगे, तो अपने गिरने के लिए फिर किसी नए सर को ढूंढेंगे, अपने गिरने का ठीकरा फोड़ने के लिए।
मेरे विचार से बाकी सब तो निपट गए, अब केवल जनता बची है।