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मालवांचल मित्र, (कल्पना मोगरा): नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 यानी महिला आरक्षण बिल से जुड़ा संविधान का 131 वाँ संशोधन बिल राजनीति के चलते दो तिहाई बहुमत न मिलने से लोकसभा में पास नहीं हो सका, जो की बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस बिल के पास होने का देश की सभी महिलाएं बेसब्री से इंतजार कर रही थी, वह मात्र राजनीति के चलते राजनीति में ही स्वाहा हो गया। किंतु यहां प्रश्न यह उपस्थित होता है की क्या आरक्षण ही हम महिलाओं के सशक्तिकरण का मानदंड है? क्या इसके बिना राजनीति में हमारा विकास संभव नहीं है? क्या इसके बिना हम राजनीति में अपनी सदस्य संख्या बढ़ा नहीं सकते? तो मेरा मानना है कि आरक्षण हमारा सिर्फ सपोर्टर हो सकता है किंतु पूर्ण सशक्तिकरण का माध्यम नहीं। आज जहां देश की महिलाओं ने इंजीनियरिंग, मेडिकल, अंतरिक्ष, शिक्षा, व्यवसाय, युद्ध विमान चलाने, समाज सेवा जैसे आदि अनेक क्षेत्रों में अपने गहन अनुभव के आधार पर अपनी योग्यता का परचम फहराया है, तो क्या हम अपनी योग्यता के आधार पर राजनीति का अनुभव लेकर लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में अपनी सफलताओं का, अपने अधिकतम वर्चस्व का परचम नहीं फहरा सकती? निश्चित फहरा सकती है, बस आवश्यकता है राजनीति से संबंधित ज्ञान के एक्सपीरियंस को प्राप्त कर पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ लक्ष्य को प्राप्त करने के जुनून की, अर्जुन की तरह चिड़िया की आंख पर दृष्टि (लक्ष्य पर दृष्टि बनाए रखने की) लगाने की। तो फिर कोई ताकत नहीं जो हमें लोकसभा एवं सभी राज्यों की विधानसभाओं में हमारे अधिक से अधिक वर्चस्व को नकार सके। मैं तो आरक्षण मात्रा को, चाहे वह जाति के आधार पर हो या लिंग के आधार पर, एक महा दिमक की तरह मानती हूं जो योग्य व्यक्ति को दरकिनार कर अयोग्य को आगे बढाता है। अतः बिल पास न होने का गम ना करें अपितु इसे चैलेंज के रूप में स्वीकार करें और देश की अधिक से अधिक महिलाएं अपनी योग्यता, अनुभव और कुशलता के दम पर लोकसभा व सभी राज्यों की विधानसभाओं में अपना वर्चस्व स्थापित कर सभी राजनीतिक पार्टियों को दिखा दें कि हम बिना आरक्षण के भी राजनीति में प्रवेश कर पूर्ण समर्पण के साथ देश की सेवा में अपने आप को न्योछावर कर सकती है। देश के विकास को सर्वोच्च स्थान पर ले जा सकती है। और यह उन पार्टियों के मुंह पर भी करारा तमाचा होगा जिन्होंने नारी शक्ति वंदन अधिनियम बिल को पास नहीं होने दिया। कल्पना मोगरा, नीमच |
मालवांचल मित्र, (कल्पना मोगरा): नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 यानी महिला आरक्षण बिल से जुड़ा संविधान का 131 वाँ संशोधन बिल राजनीति के चलते दो तिहाई बहुमत न मिलने से लोकसभा में पास नहीं हो सका, जो की बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस बिल के पास होने का देश की सभी महिलाएं बेसब्री से इंतजार कर रही थी, वह मात्र राजनीति के चलते राजनीति में ही स्वाहा हो गया।
किंतु यहां प्रश्न यह उपस्थित होता है की क्या आरक्षण ही हम महिलाओं के सशक्तिकरण का मानदंड है? क्या इसके बिना राजनीति में हमारा विकास संभव नहीं है? क्या इसके बिना हम राजनीति में अपनी सदस्य संख्या बढ़ा नहीं सकते?
तो मेरा मानना है कि आरक्षण हमारा सिर्फ सपोर्टर हो सकता है किंतु पूर्ण सशक्तिकरण का माध्यम नहीं।
आज जहां देश की महिलाओं ने इंजीनियरिंग, मेडिकल, अंतरिक्ष, शिक्षा, व्यवसाय, युद्ध विमान चलाने, समाज सेवा जैसे आदि अनेक क्षेत्रों में अपने गहन अनुभव के आधार पर अपनी योग्यता का परचम फहराया है, तो क्या हम अपनी योग्यता के आधार पर राजनीति का अनुभव लेकर लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में अपनी सफलताओं का, अपने अधिकतम वर्चस्व का परचम नहीं फहरा सकती?
निश्चित फहरा सकती है, बस आवश्यकता है राजनीति से संबंधित ज्ञान के एक्सपीरियंस को प्राप्त कर पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ लक्ष्य को प्राप्त करने के जुनून की, अर्जुन की तरह चिड़िया की आंख पर दृष्टि (लक्ष्य पर दृष्टि बनाए रखने की) लगाने की। तो फिर कोई ताकत नहीं जो हमें लोकसभा एवं सभी राज्यों की विधानसभाओं में हमारे अधिक से अधिक वर्चस्व को नकार सके।
मैं तो आरक्षण मात्रा को, चाहे वह जाति के आधार पर हो या लिंग के आधार पर, एक महा दिमक की तरह मानती हूं जो योग्य व्यक्ति को दरकिनार कर अयोग्य को आगे बढाता है।
अतः बिल पास न होने का गम ना करें अपितु इसे चैलेंज के रूप में स्वीकार करें और देश की अधिक से अधिक महिलाएं अपनी योग्यता, अनुभव और कुशलता के दम पर लोकसभा व सभी राज्यों की विधानसभाओं में अपना वर्चस्व स्थापित कर सभी राजनीतिक पार्टियों को दिखा दें कि हम बिना आरक्षण के भी राजनीति में प्रवेश कर पूर्ण समर्पण के साथ देश की सेवा में अपने आप को न्योछावर कर सकती है।
देश के विकास को सर्वोच्च स्थान पर ले जा सकती है। और यह उन पार्टियों के मुंह पर भी करारा तमाचा होगा जिन्होंने नारी शक्ति वंदन अधिनियम बिल को पास नहीं होने दिया।
कल्पना मोगरा, नीमच