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  • संपादकीय : नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
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  • मालवांचल मित्र, संपादकीय:

    गर्मी की छुट्टियाँ जैसे-जैसे खत्म होने लगती थीं, नानी के घर का हर कोना अचानक और भी प्यारा लगने लगता था।

    वही आँगन...
    जहाँ पूरे महीने धमा-चौकड़ी मचाई थी।

    वही नीम का पेड़...
    जिसकी छाँव में दोपहरें गुज़री थीं।

    वही छत...
    जहाँ रात को तारों को गिनते-गिनते कब नींद आ जाती थी, पता ही नहीं चलता था।

    लेकिन छुट्टियों के आख़िरी दो-तीन दिन...
    उनमें कुछ अलग ही बात होती थी।

    सुबह उठते ही याद आ जाता था कि अब वापस जाना है।
    मन कहीं उदास-सा हो जाता था।

    अचानक नानी के हाथ की बनी हर चीज़ और स्वादिष्ट लगने लगती थी।
    आम का अचार, पूड़ी-आलू, सेवईं, खीर...
    सब कुछ ऐसे खाते थे जैसे पता नहीं फिर कब मिलेगा।

    नानी भी शायद समझ जाती थीं कि अब विदाई करीब है।

    वो बार-बार पूछतीं—
    "बेटा, ये खा लो..."
    "वो रख दूँ साथ में..."
    "इतनी जल्दी क्या है जाने की?"

    और हम हर बार मुस्कुरा देते थे...
    क्योंकि सच बोल देते तो शायद रो पड़ते।

    उन आख़िरी दिनों में दोस्तों के साथ खेल भी कुछ ज़्यादा ही खेला जाता था।

    हर गली का एक आख़िरी चक्कर।

    हर दोस्त से एक आख़िरी मुलाक़ात।

    हर शाम को थोड़ा और लंबा करने की कोशिश।

    जैसे समय को पकड़कर रोक लेना चाहते हों।

    फिर वो दिन आता था...

    बैग पहले से ज़्यादा भारी लगता था।

    क्योंकि उसमें सिर्फ कपड़े नहीं होते थे...
    नानी का प्यार,
    घर की खुशबू,
    आँगन की यादें,
    और ढेर सारी अधूरी शरारतें भी भरी होती थीं।

    बस या ट्रेन चलने लगती थी।

    नानी हाथ हिलाती रहती थीं।

    हम खिड़की से देखते रहते थे।

    जब तक उनका चेहरा आँखों से ओझल नहीं हो जाता।

    और फिर पूरे रास्ते एक ही ख्याल आता था—

    "काश छुट्टियाँ कुछ दिन और होतीं..."

    आज हम बड़े हो गए हैं।

    जिम्मेदारियाँ हैं,
    काम है,
    समय की कमी है।

    लेकिन जब भी बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र होता है...

    तो नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं।

    कुछ यादें पुरानी नहीं होतीं...

    वे बस उम्र के साथ और कीमती होती जाती हैं।



  • संपादकीय : नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
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    मालवांचल मित्र, संपादकीय:

    गर्मी की छुट्टियाँ जैसे-जैसे खत्म होने लगती थीं, नानी के घर का हर कोना अचानक और भी प्यारा लगने लगता था।

    वही आँगन...
    जहाँ पूरे महीने धमा-चौकड़ी मचाई थी।

    वही नीम का पेड़...
    जिसकी छाँव में दोपहरें गुज़री थीं।

    वही छत...
    जहाँ रात को तारों को गिनते-गिनते कब नींद आ जाती थी, पता ही नहीं चलता था।

    लेकिन छुट्टियों के आख़िरी दो-तीन दिन...
    उनमें कुछ अलग ही बात होती थी।

    सुबह उठते ही याद आ जाता था कि अब वापस जाना है।
    मन कहीं उदास-सा हो जाता था।

    अचानक नानी के हाथ की बनी हर चीज़ और स्वादिष्ट लगने लगती थी।
    आम का अचार, पूड़ी-आलू, सेवईं, खीर...
    सब कुछ ऐसे खाते थे जैसे पता नहीं फिर कब मिलेगा।

    नानी भी शायद समझ जाती थीं कि अब विदाई करीब है।

    वो बार-बार पूछतीं—
    "बेटा, ये खा लो..."
    "वो रख दूँ साथ में..."
    "इतनी जल्दी क्या है जाने की?"

    और हम हर बार मुस्कुरा देते थे...
    क्योंकि सच बोल देते तो शायद रो पड़ते।

    उन आख़िरी दिनों में दोस्तों के साथ खेल भी कुछ ज़्यादा ही खेला जाता था।

    हर गली का एक आख़िरी चक्कर।

    हर दोस्त से एक आख़िरी मुलाक़ात।

    हर शाम को थोड़ा और लंबा करने की कोशिश।

    जैसे समय को पकड़कर रोक लेना चाहते हों।

    फिर वो दिन आता था...

    बैग पहले से ज़्यादा भारी लगता था।

    क्योंकि उसमें सिर्फ कपड़े नहीं होते थे...
    नानी का प्यार,
    घर की खुशबू,
    आँगन की यादें,
    और ढेर सारी अधूरी शरारतें भी भरी होती थीं।

    बस या ट्रेन चलने लगती थी।

    नानी हाथ हिलाती रहती थीं।

    हम खिड़की से देखते रहते थे।

    जब तक उनका चेहरा आँखों से ओझल नहीं हो जाता।

    और फिर पूरे रास्ते एक ही ख्याल आता था—

    "काश छुट्टियाँ कुछ दिन और होतीं..."

    आज हम बड़े हो गए हैं।

    जिम्मेदारियाँ हैं,
    काम है,
    समय की कमी है।

    लेकिन जब भी बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र होता है...

    तो नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं।

    कुछ यादें पुरानी नहीं होतीं...

    वे बस उम्र के साथ और कीमती होती जाती हैं।

  • पर्यावरण दिवस Special: एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!

    पर्यावरण दिवस Special:
    संपादकीय   - नीमच[05-06-2026]
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  • पर्यावरण दिवस Special: एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!

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    संपादकीय   - नीमच[05-06-2026]
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  • संपादकीय: नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    संपादकीय:
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  • नागरिक कर्तव्य: वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है

    नागरिक कर्तव्य:
    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
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     वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है
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  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]
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    कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी
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  • संपादकीय: 1 मई मजदूर दिवस – विकास की रफ्तार में छूटता इंसान

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  • संपादकीय: 1 मई मजदूर दिवस – विकास की रफ्तार में छूटता इंसान

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    संपादकीय   - नीमच[01-05-2026]
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  • संपादकीय: क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[30-04-2026]
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  • कैलाश विजयवर्गीय: जनजीवन से जुड़ा एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व

    कैलाश विजयवर्गीय:
    संपादकीय   - नीमच[19-04-2026]
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  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज: कच्ची कैरी और बचपन की यादें

    90s का सबसे खट्टा-मीठा राज:
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
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     कच्ची कैरी और बचपन की यादें
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  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

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    संपादकीय   - नीमच[06-04-2026]
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  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

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  • संपादकीय: उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर

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  • संपादकीय: “सही करने” के नाम पर कमाई का माध्यम बनता एमओयू – आमजन की कीमत पर व्यवस्था का खेल

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    संपादकीय   - नीमच[26-03-2026]
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  • संपादकीय: 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष आरक्षण नहीं संरक्षण चाहिए मुफ्त की रेवड़ियाँ नहीं रोजगार चाहिए

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[07-03-2026]
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    संपादकीय   - नीमच[07-03-2026]
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  • संपादकीय: करनाल में 75 वर्षीय डॉक्टर की दर्दनाक हालत – परिवार विदेश में, बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार | समाज के लिए बड़ा सवाल

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  • संपादकीय: करनाल में 75 वर्षीय डॉक्टर की दर्दनाक हालत – परिवार विदेश में, बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार | समाज के लिए बड़ा सवाल

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  • 24 फरवरी का इतिहास: नानाजी देशमुख का जन्म और RSS पर प्रतिबंध का प्रभाव

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