![]() ![]() ![]() ![]() ![]()
|
















|
मालवांचल मित्र, संपादकीय: गर्मी की छुट्टियाँ जैसे-जैसे खत्म होने लगती थीं, नानी के घर का हर कोना अचानक और भी प्यारा लगने लगता था। वही आँगन... वही नीम का पेड़... वही छत... लेकिन छुट्टियों के आख़िरी दो-तीन दिन...
सुबह उठते ही याद आ जाता था कि अब वापस जाना है। अचानक नानी के हाथ की बनी हर चीज़ और स्वादिष्ट लगने लगती थी। नानी भी शायद समझ जाती थीं कि अब विदाई करीब है। वो बार-बार पूछतीं— और हम हर बार मुस्कुरा देते थे...
उन आख़िरी दिनों में दोस्तों के साथ खेल भी कुछ ज़्यादा ही खेला जाता था। हर गली का एक आख़िरी चक्कर। हर दोस्त से एक आख़िरी मुलाक़ात। हर शाम को थोड़ा और लंबा करने की कोशिश। जैसे समय को पकड़कर रोक लेना चाहते हों। फिर वो दिन आता था... बैग पहले से ज़्यादा भारी लगता था। क्योंकि उसमें सिर्फ कपड़े नहीं होते थे... बस या ट्रेन चलने लगती थी।
नानी हाथ हिलाती रहती थीं। हम खिड़की से देखते रहते थे। जब तक उनका चेहरा आँखों से ओझल नहीं हो जाता। और फिर पूरे रास्ते एक ही ख्याल आता था— "काश छुट्टियाँ कुछ दिन और होतीं..." आज हम बड़े हो गए हैं। जिम्मेदारियाँ हैं, लेकिन जब भी बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र होता है... तो नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन... आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं। कुछ यादें पुरानी नहीं होतीं... वे बस उम्र के साथ और कीमती होती जाती हैं। |
मालवांचल मित्र, संपादकीय:
गर्मी की छुट्टियाँ जैसे-जैसे खत्म होने लगती थीं, नानी के घर का हर कोना अचानक और भी प्यारा लगने लगता था।
वही आँगन...
जहाँ पूरे महीने धमा-चौकड़ी मचाई थी।
वही नीम का पेड़...
जिसकी छाँव में दोपहरें गुज़री थीं।
वही छत...
जहाँ रात को तारों को गिनते-गिनते कब नींद आ जाती थी, पता ही नहीं चलता था।
लेकिन छुट्टियों के आख़िरी दो-तीन दिन...
उनमें कुछ अलग ही बात होती थी।

सुबह उठते ही याद आ जाता था कि अब वापस जाना है।
मन कहीं उदास-सा हो जाता था।
अचानक नानी के हाथ की बनी हर चीज़ और स्वादिष्ट लगने लगती थी।
आम का अचार, पूड़ी-आलू, सेवईं, खीर...
सब कुछ ऐसे खाते थे जैसे पता नहीं फिर कब मिलेगा।
नानी भी शायद समझ जाती थीं कि अब विदाई करीब है।
वो बार-बार पूछतीं—
"बेटा, ये खा लो..."
"वो रख दूँ साथ में..."
"इतनी जल्दी क्या है जाने की?"
और हम हर बार मुस्कुरा देते थे...
क्योंकि सच बोल देते तो शायद रो पड़ते।

उन आख़िरी दिनों में दोस्तों के साथ खेल भी कुछ ज़्यादा ही खेला जाता था।
हर गली का एक आख़िरी चक्कर।
हर दोस्त से एक आख़िरी मुलाक़ात।
हर शाम को थोड़ा और लंबा करने की कोशिश।
जैसे समय को पकड़कर रोक लेना चाहते हों।
फिर वो दिन आता था...
बैग पहले से ज़्यादा भारी लगता था।
क्योंकि उसमें सिर्फ कपड़े नहीं होते थे...
नानी का प्यार,
घर की खुशबू,
आँगन की यादें,
और ढेर सारी अधूरी शरारतें भी भरी होती थीं।
बस या ट्रेन चलने लगती थी।

नानी हाथ हिलाती रहती थीं।
हम खिड़की से देखते रहते थे।
जब तक उनका चेहरा आँखों से ओझल नहीं हो जाता।
और फिर पूरे रास्ते एक ही ख्याल आता था—
"काश छुट्टियाँ कुछ दिन और होतीं..."
आज हम बड़े हो गए हैं।
जिम्मेदारियाँ हैं,
काम है,
समय की कमी है।
लेकिन जब भी बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र होता है...
तो नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...
आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं।
कुछ यादें पुरानी नहीं होतीं...
वे बस उम्र के साथ और कीमती होती जाती हैं।