• होम
  • वीडियो
  • सर्च
  • Contact
× Avatar
Forgot password?
  • देशदेश
  • विदेशविदेश
  • राज्यराज्य
  • शहरशहर
  • मंडी भावमंडी भाव
  • व्यापारव्यापार
  • धर्मधर्म
  • खेलखेल
  • सुप्रभातसुप्रभात
  • चुनावचुनाव
  • मनोरंजनमनोरंजन
  • टेक्नोलॉजी समाचारटेक्नोलॉजी समाचार
  • संपादकीयसंपादकीय
  • कृषिकृषि
  • स्वास्थस्वास्थ
  • रोजगाररोजगार
  • देशदेश
  • विदेशविदेश
  • राज्यराज्य
  • शहरशहर
  • मंडी भावमंडी भाव
  • व्यापारव्यापार
  • धर्मधर्म
  • खेलखेल
  • सुप्रभातसुप्रभात
  • चुनावचुनाव
  • मनोरंजनमनोरंजन
  • टेक्नोलॉजी समाचारटेक्नोलॉजी समाचार
  • संपादकीयसंपादकीय
  • कृषिकृषि
  • स्वास्थस्वास्थ
  • रोजगाररोजगार
  • होम
  • वीडियो
  • सर्च
  • Contact
  • संपादकीय : नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • मालवांचल मित्र, संपादकीय:

    गर्मी की छुट्टियाँ जैसे-जैसे खत्म होने लगती थीं, नानी के घर का हर कोना अचानक और भी प्यारा लगने लगता था।

    वही आँगन...
    जहाँ पूरे महीने धमा-चौकड़ी मचाई थी।

    वही नीम का पेड़...
    जिसकी छाँव में दोपहरें गुज़री थीं।

    वही छत...
    जहाँ रात को तारों को गिनते-गिनते कब नींद आ जाती थी, पता ही नहीं चलता था।

    लेकिन छुट्टियों के आख़िरी दो-तीन दिन...
    उनमें कुछ अलग ही बात होती थी।

    सुबह उठते ही याद आ जाता था कि अब वापस जाना है।
    मन कहीं उदास-सा हो जाता था।

    अचानक नानी के हाथ की बनी हर चीज़ और स्वादिष्ट लगने लगती थी।
    आम का अचार, पूड़ी-आलू, सेवईं, खीर...
    सब कुछ ऐसे खाते थे जैसे पता नहीं फिर कब मिलेगा।

    नानी भी शायद समझ जाती थीं कि अब विदाई करीब है।

    वो बार-बार पूछतीं—
    "बेटा, ये खा लो..."
    "वो रख दूँ साथ में..."
    "इतनी जल्दी क्या है जाने की?"

    और हम हर बार मुस्कुरा देते थे...
    क्योंकि सच बोल देते तो शायद रो पड़ते।

    उन आख़िरी दिनों में दोस्तों के साथ खेल भी कुछ ज़्यादा ही खेला जाता था।

    हर गली का एक आख़िरी चक्कर।

    हर दोस्त से एक आख़िरी मुलाक़ात।

    हर शाम को थोड़ा और लंबा करने की कोशिश।

    जैसे समय को पकड़कर रोक लेना चाहते हों।

    फिर वो दिन आता था...

    बैग पहले से ज़्यादा भारी लगता था।

    क्योंकि उसमें सिर्फ कपड़े नहीं होते थे...
    नानी का प्यार,
    घर की खुशबू,
    आँगन की यादें,
    और ढेर सारी अधूरी शरारतें भी भरी होती थीं।

    बस या ट्रेन चलने लगती थी।

    नानी हाथ हिलाती रहती थीं।

    हम खिड़की से देखते रहते थे।

    जब तक उनका चेहरा आँखों से ओझल नहीं हो जाता।

    और फिर पूरे रास्ते एक ही ख्याल आता था—

    "काश छुट्टियाँ कुछ दिन और होतीं..."

    आज हम बड़े हो गए हैं।

    जिम्मेदारियाँ हैं,
    काम है,
    समय की कमी है।

    लेकिन जब भी बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र होता है...

    तो नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं।

    कुछ यादें पुरानी नहीं होतीं...

    वे बस उम्र के साथ और कीमती होती जाती हैं।



  • संपादकीय : नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    संपादकीय
    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp

    मालवांचल मित्र, संपादकीय:

    गर्मी की छुट्टियाँ जैसे-जैसे खत्म होने लगती थीं, नानी के घर का हर कोना अचानक और भी प्यारा लगने लगता था।

    वही आँगन...
    जहाँ पूरे महीने धमा-चौकड़ी मचाई थी।

    वही नीम का पेड़...
    जिसकी छाँव में दोपहरें गुज़री थीं।

    वही छत...
    जहाँ रात को तारों को गिनते-गिनते कब नींद आ जाती थी, पता ही नहीं चलता था।

    लेकिन छुट्टियों के आख़िरी दो-तीन दिन...
    उनमें कुछ अलग ही बात होती थी।

    सुबह उठते ही याद आ जाता था कि अब वापस जाना है।
    मन कहीं उदास-सा हो जाता था।

    अचानक नानी के हाथ की बनी हर चीज़ और स्वादिष्ट लगने लगती थी।
    आम का अचार, पूड़ी-आलू, सेवईं, खीर...
    सब कुछ ऐसे खाते थे जैसे पता नहीं फिर कब मिलेगा।

    नानी भी शायद समझ जाती थीं कि अब विदाई करीब है।

    वो बार-बार पूछतीं—
    "बेटा, ये खा लो..."
    "वो रख दूँ साथ में..."
    "इतनी जल्दी क्या है जाने की?"

    और हम हर बार मुस्कुरा देते थे...
    क्योंकि सच बोल देते तो शायद रो पड़ते।

    उन आख़िरी दिनों में दोस्तों के साथ खेल भी कुछ ज़्यादा ही खेला जाता था।

    हर गली का एक आख़िरी चक्कर।

    हर दोस्त से एक आख़िरी मुलाक़ात।

    हर शाम को थोड़ा और लंबा करने की कोशिश।

    जैसे समय को पकड़कर रोक लेना चाहते हों।

    फिर वो दिन आता था...

    बैग पहले से ज़्यादा भारी लगता था।

    क्योंकि उसमें सिर्फ कपड़े नहीं होते थे...
    नानी का प्यार,
    घर की खुशबू,
    आँगन की यादें,
    और ढेर सारी अधूरी शरारतें भी भरी होती थीं।

    बस या ट्रेन चलने लगती थी।

    नानी हाथ हिलाती रहती थीं।

    हम खिड़की से देखते रहते थे।

    जब तक उनका चेहरा आँखों से ओझल नहीं हो जाता।

    और फिर पूरे रास्ते एक ही ख्याल आता था—

    "काश छुट्टियाँ कुछ दिन और होतीं..."

    आज हम बड़े हो गए हैं।

    जिम्मेदारियाँ हैं,
    काम है,
    समय की कमी है।

    लेकिन जब भी बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का ज़िक्र होता है...

    तो नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं।

    कुछ यादें पुरानी नहीं होतीं...

    वे बस उम्र के साथ और कीमती होती जाती हैं।

  • विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: अखंड भारत की स्मृति से आज के भारत तक

    विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस:
    संपादकीय   - नीमच[14-08-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: अखंड भारत की स्मृति से आज के भारत तक

     अखंड भारत की स्मृति से आज के भारत तक
    संपादकीय   - नीमच[14-08-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक: क्या हम पुस्तकालयों को भूलते जा रहे हैं?

    पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक:
    संपादकीय   - नीमच[12-08-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक: क्या हम पुस्तकालयों को भूलते जा रहे हैं?

     क्या हम पुस्तकालयों को भूलते जा रहे हैं?
    संपादकीय   - नीमच[12-08-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां: क्या आपको पता है, अपने ही लिखे साहित्य में उन्हें सबसे ज्यादा कौन-सी कहानियां प्रिय थीं?

    प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां:
    संपादकीय   - नीमच[31-07-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां: क्या आपको पता है, अपने ही लिखे साहित्य में उन्हें सबसे ज्यादा कौन-सी कहानियां प्रिय थीं?

     क्या आपको पता है, अपने ही लिखे साहित्य में उन्हें सबसे ज्यादा कौन-सी कहानियां प्रिय थीं?
    संपादकीय   - नीमच[31-07-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • 1 जुलाई: जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं

    1 जुलाई:
    संपादकीय   - नीमच[30-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • 1 जुलाई: जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं

     जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं
    संपादकीय   - नीमच[30-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • पर्यावरण दिवस Special: एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!

    पर्यावरण दिवस Special:
    संपादकीय   - नीमच[05-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • पर्यावरण दिवस Special: एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!

     एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!
    संपादकीय   - नीमच[05-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...
    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • नागरिक कर्तव्य: वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है

    नागरिक कर्तव्य:
    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • नागरिक कर्तव्य: वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है

     वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है
    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

    कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी
    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: 1 मई मजदूर दिवस – विकास की रफ्तार में छूटता इंसान

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[01-05-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: 1 मई मजदूर दिवस – विकास की रफ्तार में छूटता इंसान

     1 मई मजदूर दिवस – विकास की रफ्तार में छूटता इंसान
    संपादकीय   - नीमच[01-05-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[30-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?

    क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?
    संपादकीय   - नीमच[30-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • कैलाश विजयवर्गीय: जनजीवन से जुड़ा एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व

    कैलाश विजयवर्गीय:
    संपादकीय   - नीमच[19-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • कैलाश विजयवर्गीय: जनजीवन से जुड़ा एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व

     जनजीवन से जुड़ा एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व
    संपादकीय   - नीमच[19-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज: कच्ची कैरी और बचपन की यादें

    90s का सबसे खट्टा-मीठा राज:
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज: कच्ची कैरी और बचपन की यादें

     कच्ची कैरी और बचपन की यादें
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[06-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

    मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य
    संपादकीय   - नीमच[06-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[03-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

    नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल
    संपादकीय   - नीमच[03-04-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[30-03-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • संपादकीय: उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर

    उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर
    संपादकीय   - नीमच[30-03-2026]
    • Facebook
    • Twitter
    • WhatsApp
    Facebook Twitter WhatsApp
  • LoginLogin