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  • नागरिक कर्तव्य : वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
    नागरिक कर्तव्य
    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
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  • मालवांचल मित्र, (संपादकीय): हम भारतीय नागरिक बड़े कमाल के जीव हैं। अधिकारों के मामले में हमारी जागरूकता ऐसी है कि संविधान भी कभी-कभी नोट्स लेने बैठ जाए। लेकिन जैसे ही “कर्तव्य” शब्द कान में पड़ता है, आत्मा एयरप्लेन मोड में चली जाती है।

    प्लास्टिक की थैली हमारी संस्कृति का ऐसा हिस्सा बन चुकी है कि अब वो सिर्फ सामान रखने की चीज नहीं, जीवन दर्शन है। सब्जी उसी में, कचरा उसी में, और कभी-कभी श्रद्धा भी उसी में बांधकर नाली में प्रवाहित। फिर जब कचरा वाहन मोहल्ले में घंटी बजाते हुए आता है, तो हम खिड़की से ऐसे झांकते हैं जैसे बारात निकली हो। वीडियो बनाएंगे, स्टेटस लगाएंगे, पर नीचे उतरकर कचरा देना? इतनी मेहनत लोकतंत्र में किसने लिखी है भाई।

    नगर पालिका परिषद के बोर्ड पर बड़े भारी-भरकम शब्द लिखे होते हैं— नगर विकास, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जल वितरण। पढ़कर लगता है जैसे किसी IAS कोचिंग का पूरा सिलेबस टांग दिया हो। शहर में दर्जनों पार्षद हैं, कुछ “वरिष्ठ” भी हैं। वरिष्ठ इसलिए क्योंकि चुनाव जीतने के बाद जनता से दूरी बनाए रखना इन्हें राजनीतिक परिपक्वता लगता है। चुनाव से पहले जो गली-गली “भाई साहब, आशीर्वाद दीजिए” बोलते थे, वही जीत के बाद ऐसे गायब होते हैं जैसे नेटफ्लिक्स से अच्छी फिल्में।

    लेकिन असली मजा तो हम नागरिकों में है।
    नल में पानी कम आए तो पार्षद का पुतला। सड़क पर गड्ढा हो तो कलेक्टर को टैग। बिजली जाए तो पूरी कॉलोनी की DP काली। पर जैसे ही कोई बोले “भाई, कचरा गाड़ी में डाल दिया करो”… बस वहीं राष्ट्रभक्ति की बैटरी लो हो जाती है।

    मोबाइल हाथ में आते ही हर नागरिक सामाजिक कार्यकर्ता बन जाता है। “सिस्टम खराब है” लिखकर फेसबुक पर पोस्ट डालेंगे, और पोस्ट डालने के बाद वही चिप्स का पैकेट सड़क पर फेंक देंगे। मानो देश सुधारने का ठेका सिर्फ कमेंट सेक्शन में मिला हो।

    प्रधानमंत्री ने झाड़ू उठाई तो कैमरे चमके, अभियान चला। इंदौर वालों ने उसे इवेंट नहीं, आदत बना लिया। हर साल स्वच्छता का नंबर-1 कप जीतते हैं और गर्व से फोटो खिंचवाते हैं। लेकिन फर्क ये है कि वहां लोग सिर्फ सेल्फी नहीं लेते, डस्टबिन भी इस्तेमाल करते हैं। यहां तो हालत ये है कि गाड़ी में बैठे-बैठे शहर पर गर्व करेंगे, पर खिड़की खोलकर पानी की बोतल बाहर फेंक देंगे।

    अब बड़ा सवाल—
    जब हर गली में कचरा गाड़ी आ रही है, घंटी बजा रही है, तो फिर सड़क पर ये कचरा आता कहां से है?

    क्या गाड़ी से उड़कर गिरता है?
    नहीं साहब। ये VIP कचरा है। इसका रूट तय है—
    घर → बालकनी → गली → नाली।

    थैली भरते ही कुछ लोगों के अंदर क्रिकेटर की आत्मा जाग जाती है। बालकनी से ऐसा थ्रो मारते हैं जैसे IPL का फाइनल खेल रहे हों। निशाना नाली में लगे या पड़ोसी के दरवाजे पर, फर्क नहीं पड़ता। आखिर सफाईकर्मी है ना। वो साफ कर देगा। क्योंकि हमारे दिमाग में सफाईकर्मी इंसान नहीं, सिस्टम का डिलीट बटन है।

    मजेदार बात देखिए।
    अगर मोहल्ले में चोरी बढ़ जाए, तो रातों-रात “नागरिक सुरक्षा समिति” बन जाती है। लाठी, टॉर्च, सीटी, व्हाट्सएप ग्रुप सब एक्टिव। “2 से 4 बजे तक शर्मा जी जागेंगे।”
    मतलब बाइक और फ्रिज बचाने के लिए पूरी कॉलोनी जाग सकती है, लेकिन मोहल्ला साफ रखने के लिए सबको अचानक नींद आने लगती है।

    और जनप्रतिनिधियों की बात करें तो चुनाव से पहले “पैर छू सरकार”, और जीतने के बाद “कौन हो तुम सरकार” वाला भाव आ जाता है। जनता सोचती है कि पार्षद साहब आएंगे और हाथ जोड़कर कहेंगे— “मालिक, कृपा करके कचरा गाड़ी में डाल दीजिए।”
    लेकिन शपथ लेते ही उनका रूट बदल जाता है—
    घर → पालिका → ठेकेदार → फार्महाउस।
    वार्ड बीच में कहीं छूट जाता है।

    फिर भी सच्चाई सिर्फ नेताओं की नहीं, हमारी भी है।
    इंदौर भी इसी देश में है। वहां के लोगों के भी दो हाथ-पैर ही हैं। फर्क बस इतना है कि उन्होंने मान लिया कि “शहर मेरा है।”
    और हमने मान लिया कि “शहर नगर पालिका के बाप का है।”

    इंदौर नंबर-1 इसलिए नहीं बना कि वहां सिर्फ सफाईकर्मी मेहनती हैं। वो इसलिए बना क्योंकि वहां झाड़ू कर्मचारियों के हाथ में ही नहीं, नागरिकों के जमीर में भी है।

    हम अभी भी उसी स्टेज पर हैं जहां अलार्म 10 साल से बज रहा है और हम चादर तानकर बोल रहे हैं— “बस 5 मिनट और…”

    याद रखिए, अध्यक्ष और पार्षद का दायित्व 5 साल का होता है। कुर्सी गई, जिम्मेदारी खत्म।
    लेकिन नागरिक का दायित्व उम्रभर का होता है।
    आप ट्रांसफर नहीं ले सकते। रिटायर नहीं हो सकते।
    ये शहर आपका घर है, किसी नेता का ससुराल नहीं।

    तो अगली बार अगर आप कचरा गाड़ी आने के बाद भी थैली नाली में फेंक दें, तो आईने में देखकर एक बार जरूर बोलिए—

    “मैं ही वो चूक हूं, जिसकी वजह से सफाईकर्मी नाली में है और मेरा शहर नाले में।”

    वरना आने वाली पीढ़ी स्कूल में निबंध लिखेगी—
    “हमारा नीमच: जो नंबर-1 बन सकता था।”

    क्योंकि सच यही है—
    अधिकार मांगने में हम शेर हैं,
    और कर्तव्य निभाने में ढेर।
    इसी ढेर से तो पूरा कचरा बनता है।







  • नागरिक कर्तव्य : वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है

    PRAVEEN ARONDEKAR   - नीमच
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    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
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    मालवांचल मित्र, (संपादकीय): हम भारतीय नागरिक बड़े कमाल के जीव हैं। अधिकारों के मामले में हमारी जागरूकता ऐसी है कि संविधान भी कभी-कभी नोट्स लेने बैठ जाए। लेकिन जैसे ही “कर्तव्य” शब्द कान में पड़ता है, आत्मा एयरप्लेन मोड में चली जाती है।

    प्लास्टिक की थैली हमारी संस्कृति का ऐसा हिस्सा बन चुकी है कि अब वो सिर्फ सामान रखने की चीज नहीं, जीवन दर्शन है। सब्जी उसी में, कचरा उसी में, और कभी-कभी श्रद्धा भी उसी में बांधकर नाली में प्रवाहित। फिर जब कचरा वाहन मोहल्ले में घंटी बजाते हुए आता है, तो हम खिड़की से ऐसे झांकते हैं जैसे बारात निकली हो। वीडियो बनाएंगे, स्टेटस लगाएंगे, पर नीचे उतरकर कचरा देना? इतनी मेहनत लोकतंत्र में किसने लिखी है भाई।

    नगर पालिका परिषद के बोर्ड पर बड़े भारी-भरकम शब्द लिखे होते हैं— नगर विकास, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जल वितरण। पढ़कर लगता है जैसे किसी IAS कोचिंग का पूरा सिलेबस टांग दिया हो। शहर में दर्जनों पार्षद हैं, कुछ “वरिष्ठ” भी हैं। वरिष्ठ इसलिए क्योंकि चुनाव जीतने के बाद जनता से दूरी बनाए रखना इन्हें राजनीतिक परिपक्वता लगता है। चुनाव से पहले जो गली-गली “भाई साहब, आशीर्वाद दीजिए” बोलते थे, वही जीत के बाद ऐसे गायब होते हैं जैसे नेटफ्लिक्स से अच्छी फिल्में।

    लेकिन असली मजा तो हम नागरिकों में है।
    नल में पानी कम आए तो पार्षद का पुतला। सड़क पर गड्ढा हो तो कलेक्टर को टैग। बिजली जाए तो पूरी कॉलोनी की DP काली। पर जैसे ही कोई बोले “भाई, कचरा गाड़ी में डाल दिया करो”… बस वहीं राष्ट्रभक्ति की बैटरी लो हो जाती है।

    मोबाइल हाथ में आते ही हर नागरिक सामाजिक कार्यकर्ता बन जाता है। “सिस्टम खराब है” लिखकर फेसबुक पर पोस्ट डालेंगे, और पोस्ट डालने के बाद वही चिप्स का पैकेट सड़क पर फेंक देंगे। मानो देश सुधारने का ठेका सिर्फ कमेंट सेक्शन में मिला हो।

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    अब बड़ा सवाल—
    जब हर गली में कचरा गाड़ी आ रही है, घंटी बजा रही है, तो फिर सड़क पर ये कचरा आता कहां से है?

    क्या गाड़ी से उड़कर गिरता है?
    नहीं साहब। ये VIP कचरा है। इसका रूट तय है—
    घर → बालकनी → गली → नाली।

    थैली भरते ही कुछ लोगों के अंदर क्रिकेटर की आत्मा जाग जाती है। बालकनी से ऐसा थ्रो मारते हैं जैसे IPL का फाइनल खेल रहे हों। निशाना नाली में लगे या पड़ोसी के दरवाजे पर, फर्क नहीं पड़ता। आखिर सफाईकर्मी है ना। वो साफ कर देगा। क्योंकि हमारे दिमाग में सफाईकर्मी इंसान नहीं, सिस्टम का डिलीट बटन है।

    मजेदार बात देखिए।
    अगर मोहल्ले में चोरी बढ़ जाए, तो रातों-रात “नागरिक सुरक्षा समिति” बन जाती है। लाठी, टॉर्च, सीटी, व्हाट्सएप ग्रुप सब एक्टिव। “2 से 4 बजे तक शर्मा जी जागेंगे।”
    मतलब बाइक और फ्रिज बचाने के लिए पूरी कॉलोनी जाग सकती है, लेकिन मोहल्ला साफ रखने के लिए सबको अचानक नींद आने लगती है।

    और जनप्रतिनिधियों की बात करें तो चुनाव से पहले “पैर छू सरकार”, और जीतने के बाद “कौन हो तुम सरकार” वाला भाव आ जाता है। जनता सोचती है कि पार्षद साहब आएंगे और हाथ जोड़कर कहेंगे— “मालिक, कृपा करके कचरा गाड़ी में डाल दीजिए।”
    लेकिन शपथ लेते ही उनका रूट बदल जाता है—
    घर → पालिका → ठेकेदार → फार्महाउस।
    वार्ड बीच में कहीं छूट जाता है।

    फिर भी सच्चाई सिर्फ नेताओं की नहीं, हमारी भी है।
    इंदौर भी इसी देश में है। वहां के लोगों के भी दो हाथ-पैर ही हैं। फर्क बस इतना है कि उन्होंने मान लिया कि “शहर मेरा है।”
    और हमने मान लिया कि “शहर नगर पालिका के बाप का है।”

    इंदौर नंबर-1 इसलिए नहीं बना कि वहां सिर्फ सफाईकर्मी मेहनती हैं। वो इसलिए बना क्योंकि वहां झाड़ू कर्मचारियों के हाथ में ही नहीं, नागरिकों के जमीर में भी है।

    हम अभी भी उसी स्टेज पर हैं जहां अलार्म 10 साल से बज रहा है और हम चादर तानकर बोल रहे हैं— “बस 5 मिनट और…”

    याद रखिए, अध्यक्ष और पार्षद का दायित्व 5 साल का होता है। कुर्सी गई, जिम्मेदारी खत्म।
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    “मैं ही वो चूक हूं, जिसकी वजह से सफाईकर्मी नाली में है और मेरा शहर नाले में।”

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  • विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: अखंड भारत की स्मृति से आज के भारत तक

    विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस:
    संपादकीय   - नीमच[14-08-2026]
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  • पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक: क्या हम पुस्तकालयों को भूलते जा रहे हैं?

    पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक:
    संपादकीय   - नीमच[12-08-2026]
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  • पुस्तकालय दिवस विशेष - किताबों की खुशबू से ई-लाइब्रेरी की स्क्रीन तक: क्या हम पुस्तकालयों को भूलते जा रहे हैं?

     क्या हम पुस्तकालयों को भूलते जा रहे हैं?
    संपादकीय   - नीमच[12-08-2026]
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  • प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां: क्या आपको पता है, अपने ही लिखे साहित्य में उन्हें सबसे ज्यादा कौन-सी कहानियां प्रिय थीं?

    प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां:
    संपादकीय   - नीमच[31-07-2026]
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  • प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियां: क्या आपको पता है, अपने ही लिखे साहित्य में उन्हें सबसे ज्यादा कौन-सी कहानियां प्रिय थीं?

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    संपादकीय   - नीमच[31-07-2026]
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  • 1 जुलाई: जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं

    1 जुलाई:
    संपादकीय   - नीमच[30-06-2026]
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  • 1 जुलाई: जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं

     जब नया बस्ता पहनकर लगता था हम हीरो बन गए हैं
    संपादकीय   - नीमच[30-06-2026]
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  • पर्यावरण दिवस Special: एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!

    पर्यावरण दिवस Special:
    संपादकीय   - नीमच[05-06-2026]
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  • पर्यावरण दिवस Special: एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!

     एक पेड़ लगाओ, दस सेल्फी पाओ!
    संपादकीय   - नीमच[05-06-2026]
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  • संपादकीय: नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

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    संपादकीय   - नीमच[03-06-2026]
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  • संपादकीय: नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...

    नानी के घर छुट्टियों के आख़िरी वो दिन...
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  • नागरिक कर्तव्य: वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है

    नागरिक कर्तव्य:
    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
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  • नागरिक कर्तव्य: वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है

     वो रिश्तेदार जो सिर्फ शादी के कार्ड पर याद आता है
    संपादकीय   - नीमच[19-05-2026]
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  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

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    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]
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  • संपादकीय: कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी

    कुछ किस्से रेल यात्रा के — ओमप्रकाश चौधरी
    संपादकीय   - नीमच[03-05-2026]
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  • संपादकीय: 1 मई मजदूर दिवस – विकास की रफ्तार में छूटता इंसान

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    संपादकीय   - नीमच[01-05-2026]
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  • संपादकीय: क्या हमारी पसंद सच में हमारी है—या हमें “पसंद करना” सिखाया जा रहा है?

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[30-04-2026]
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  • कैलाश विजयवर्गीय: जनजीवन से जुड़ा एक सक्रिय राजनीतिक व्यक्तित्व

    कैलाश विजयवर्गीय:
    संपादकीय   - नीमच[19-04-2026]
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  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज: कच्ची कैरी और बचपन की यादें

    90s का सबसे खट्टा-मीठा राज:
    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
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  • 90s का सबसे खट्टा-मीठा राज: कच्ची कैरी और बचपन की यादें

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    संपादकीय   - नीमच[08-04-2026]
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  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

    संपादकीय:
    संपादकीय   - नीमच[06-04-2026]
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  • संपादकीय: मध्य पूर्व के युद्ध का भारत पर प्रभाव, सरकार का दायित्व और नागरिकों के कर्तव्य

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  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

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    संपादकीय   - नीमच[03-04-2026]
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  • संपादकीय: नीमच के किसानों के साथ अन्याय? बीज विकास निगम की गैरमौजूदगी पर उठे बड़े सवाल

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  • संपादकीय: उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर

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    संपादकीय   - नीमच[30-03-2026]
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  • संपादकीय: उद्योगों के नाम पर सरकारी जमीनों का हेरफेर

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