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मालवांचल मित्र | विशेष आलेख 14 अगस्त… कैलेंडर पर यह तारीख स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले आती है। लेकिन भारत के इतिहास में यह सिर्फ 15 अगस्त की पूर्व संध्या नहीं है। यह वह दिन है जब आजादी की खुशी के साथ बंटवारे का दर्द भी जुड़ा हुआ है। इसी दर्द, विस्थापन, हिंसा और अपने घर-आंगन से उजड़ गए लाखों लोगों की स्मृति में भारत सरकार ने 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय 2021 में लिया था। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य विभाजन के दौरान जान गंवाने और विस्थापित होने वाले लोगों के संघर्ष और बलिदान को याद करना तथा सामाजिक सद्भाव और एकता को मजबूत करना है। एक तरफ आजादी, दूसरी तरफ बंटवारा 1947 का साल भारत के लिए विरोधाभासों से भरा था। एक तरफ सदियों की गुलामी के बाद स्वतंत्रता का सूरज उग रहा था, दूसरी तरफ उसी समय देश की सीमाओं पर खून की लकीर खिंच रही थी। ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ और भारत तथा पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने। पंजाब और बंगाल जैसे प्रदेशों का भी विभाजन हुआ। सीमाएं खींचने का फैसला कागज पर कुछ रेखाओं से हुआ, लेकिन जमीन पर उन रेखाओं ने लोगों की जिंदगी बदल दी। जिस गांव में पीढ़ियों से घर था, वह अचानक दूसरे देश में चला गया। जिस खेत में दादा ने हल चलाया था, वहां जाने के लिए अब सीमा पार करनी पड़ती थी। जिस शहर में पड़ोसी पीढ़ियों से साथ रहते थे, वहां अचानक धर्म पहचान का सबसे बड़ा आधार बन गया। यही विभाजन की असली त्रासदी थी। सरकारी प्रकाशनों में विभाजन के कारण लगभग 2 करोड़ लोगों के विस्थापन का उल्लेख मिलता है। मौतों के आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में अलग हैं; भारत सरकार के एक प्रकाशन में अनुमान 5 लाख से 10 लाख के बीच बताया गया है। यानी यह सिर्फ नक्शे का विभाजन नहीं था। यह घरों, परिवारों, रिश्तों और स्मृतियों का विभाजन था।
‘अखंड भारत’ आखिर है क्या? अब सवाल आता है—जब हम विभाजन की बात करते हैं तो ‘अखंड भारत’ की चर्चा क्यों होती है? अखंड भारत की धारणा मूलतः उस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक भूगोल की कल्पना से जुड़ी है जिसमें आज के भारत के साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश और कभी-कभी वर्तमान अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका तथा म्यांमार के कुछ हिस्सों को भी व्यापक भारतीय सभ्यता और ऐतिहासिक संपर्क के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन यहां एक बात साफ समझना जरूरी है—‘अखंड भारत’ कोई वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक सीमा का आधिकारिक नक्शा नहीं है। यह अलग-अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक धाराओं में अलग अर्थों में इस्तेमाल होने वाली ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अवधारणा है। इसलिए इतिहास को समझते समय भावनाओं के साथ तथ्यों को भी साथ रखना जरूरी है। क्योंकि इतिहास में नक्शे बदलते रहे हैं, साम्राज्य बदलते रहे हैं, राजधानियां बदलती रही हैं और सत्ता के केंद्र भी बदलते रहे हैं। लेकिन सांस्कृतिक रिश्ते कई बार राजनीतिक सीमाओं से ज्यादा लंबे समय तक चलते हैं। तब का भारत और आज का भारत अगर 1947 से पहले के व्यापक भारतीय उपमहाद्वीप और आज के भारत की तुलना करें तो अंतर बहुत बड़ा दिखाई देता है।
आज का भारत 1947 के भारत से सिर्फ इसलिए अलग नहीं है कि उसका नक्शा बदल गया। आज भारत ने एक संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी व्यवस्था, न्यायपालिका, संघीय ढांचे और आधुनिक अर्थव्यवस्था के साथ अपनी एक अलग राष्ट्रीय यात्रा तय की है। इसलिए अखंड भारत की चर्चा करते समय आज के भारत की उपलब्धियों और वास्तविकताओं को नजरअंदाज करना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
विभाजन ने क्या सिखाया? विभाजन की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि नफरत की राजनीति का अंतिम परिणाम आम आदमी भुगतता है। नेता भाषण देते हैं। सीमाएं कागज पर खिंचती हैं। लेकिन घर छोड़ने वाला आम आदमी होता है। ट्रेन में बैठकर अपना गांव छोड़ने वाला आम आदमी होता है। सालों की कमाई पीछे छोड़कर नए शहर में जिंदगी शुरू करने वाला आम आदमी होता है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों ने विभाजन की आग देखी, उनमें से बहुत से लोग शायद कभी नहीं चाहते थे कि उनका पड़ोसी उनका दुश्मन बने। इतिहास का यह अध्याय इसलिए याद रखना जरूरी है क्योंकि समाज जब अपनी साझा स्मृतियां भूलने लगता है, तब छोटी-छोटी दरारें बड़ी दीवारों में बदल सकती हैं।
अखंड भारत का सपना या मजबूत भारत का संकल्प? अखंड भारत को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक विचार हो सकते हैं। कोई इसे सांस्कृतिक एकता के रूप में देखता है, कोई ऐतिहासिक भूगोल के रूप में और कोई राजनीतिक कल्पना के रूप में। लेकिन आज के भारत के सामने एक ज्यादा व्यावहारिक सवाल भी है— क्या हम वर्तमान भारत को इतना मजबूत, सुरक्षित, समृद्ध और सामाजिक रूप से एकजुट बना सकते हैं कि आने वाली पीढ़ियां विभाजन को सिर्फ इतिहास की किताब में पढ़ें, उसकी पीड़ा को दोहराना न पड़े? क्योंकि अगर अखंडता की बात सिर्फ नक्शे तक सीमित रह जाए और समाज भीतर से बंटता रहे, तो फिर नक्शा कितना भी बड़ा क्यों न हो, राष्ट्र मजबूत नहीं कहलाएगा। इसके उलट अगर देश के भीतर नागरिकों के बीच भरोसा, कानून का सम्मान, सामाजिक सद्भाव और विकास मजबूत हो, तो मौजूदा भारत की एकता कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण बनती है। आज के भारत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी 14 अगस्त को याद करना केवल अतीत पर आंसू बहाना नहीं होना चाहिए। यह सवाल पूछने का दिन भी होना चाहिए— हमने इतिहास से क्या सीखा? क्या हम अपने बच्चों को विभाजन की कहानी सिर्फ हिंदू-मुस्लिम या भारत-पाकिस्तान के चश्मे से बताएंगे? या उन्हें यह भी बताएंगे कि उस दौर में इंसानियत के उदाहरण भी मौजूद थे? ऐसे अनेक परिवार और व्यक्ति थे जिन्होंने मुश्किल समय में दूसरे समुदाय के लोगों की मदद की। यही इतिहास का दूसरा चेहरा है—हिंसा के बीच इंसानियत की छोटी-छोटी रोशनियां। इसलिए विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का संदेश सिर्फ दर्द नहीं, मानवीय संवेदना और सामाजिक एकता भी होना चाहिए। भारत सरकार ने भी इस दिवस के उद्देश्य में भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना को दूर कर एकता तथा सामाजिक सद्भाव मजबूत करने पर जोर दिया है। नक्शे से बड़ा राष्ट्र अखंड भारत की कल्पना इतिहास में अपनी जगह रखती है। विभाजन की पीड़ा भी इतिहास का अटल सत्य है। और आज का भारत भी अपनी स्वतंत्र पहचान और संवैधानिक व्यवस्था के साथ एक वास्तविकता है। इन तीनों को एक साथ समझना जरूरी है। अखंड भारत हमें अपनी सभ्यतागत और सांस्कृतिक जड़ों की याद दिला सकता है। 14 अगस्त इसलिए सिर्फ दुख का दिन नहीं है। यह स्मृति का दिन है। यह आत्ममंथन का दिन है। और सबसे बढ़कर यह संकल्प लेने का दिन है कि इतिहास को भूलेंगे नहीं, लेकिन इतिहास की त्रासदियों को भविष्य की नियति भी नहीं बनने देंगे। क्योंकि देश सिर्फ जमीन के टुकड़े से नहीं बनता। देश बनता है—लोगों से, उनकी स्मृतियों से, उनके भरोसे से और उस साझा भविष्य से जिसे वे मिलकर बनाना चाहते हैं। — मालवांचल मित्र, विशेष आलेख |
मालवांचल मित्र | विशेष आलेख
14 अगस्त… कैलेंडर पर यह तारीख स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले आती है। लेकिन भारत के इतिहास में यह सिर्फ 15 अगस्त की पूर्व संध्या नहीं है। यह वह दिन है जब आजादी की खुशी के साथ बंटवारे का दर्द भी जुड़ा हुआ है।
इसी दर्द, विस्थापन, हिंसा और अपने घर-आंगन से उजड़ गए लाखों लोगों की स्मृति में भारत सरकार ने 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय 2021 में लिया था। सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य विभाजन के दौरान जान गंवाने और विस्थापित होने वाले लोगों के संघर्ष और बलिदान को याद करना तथा सामाजिक सद्भाव और एकता को मजबूत करना है।
एक तरफ आजादी, दूसरी तरफ बंटवारा
1947 का साल भारत के लिए विरोधाभासों से भरा था।
एक तरफ सदियों की गुलामी के बाद स्वतंत्रता का सूरज उग रहा था, दूसरी तरफ उसी समय देश की सीमाओं पर खून की लकीर खिंच रही थी।
ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ और भारत तथा पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने। पंजाब और बंगाल जैसे प्रदेशों का भी विभाजन हुआ। सीमाएं खींचने का फैसला कागज पर कुछ रेखाओं से हुआ, लेकिन जमीन पर उन रेखाओं ने लोगों की जिंदगी बदल दी।
जिस गांव में पीढ़ियों से घर था, वह अचानक दूसरे देश में चला गया।
जिस खेत में दादा ने हल चलाया था, वहां जाने के लिए अब सीमा पार करनी पड़ती थी।
जिस शहर में पड़ोसी पीढ़ियों से साथ रहते थे, वहां अचानक धर्म पहचान का सबसे बड़ा आधार बन गया।
यही विभाजन की असली त्रासदी थी।
सरकारी प्रकाशनों में विभाजन के कारण लगभग 2 करोड़ लोगों के विस्थापन का उल्लेख मिलता है। मौतों के आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में अलग हैं; भारत सरकार के एक प्रकाशन में अनुमान 5 लाख से 10 लाख के बीच बताया गया है।
यानी यह सिर्फ नक्शे का विभाजन नहीं था। यह घरों, परिवारों, रिश्तों और स्मृतियों का विभाजन था।

‘अखंड भारत’ आखिर है क्या?
अब सवाल आता है—जब हम विभाजन की बात करते हैं तो ‘अखंड भारत’ की चर्चा क्यों होती है?
अखंड भारत की धारणा मूलतः उस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक भूगोल की कल्पना से जुड़ी है जिसमें आज के भारत के साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश और कभी-कभी वर्तमान अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका तथा म्यांमार के कुछ हिस्सों को भी व्यापक भारतीय सभ्यता और ऐतिहासिक संपर्क के संदर्भ में देखा जाता है।
लेकिन यहां एक बात साफ समझना जरूरी है—‘अखंड भारत’ कोई वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक सीमा का आधिकारिक नक्शा नहीं है। यह अलग-अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक धाराओं में अलग अर्थों में इस्तेमाल होने वाली ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अवधारणा है।
इसलिए इतिहास को समझते समय भावनाओं के साथ तथ्यों को भी साथ रखना जरूरी है।
क्योंकि इतिहास में नक्शे बदलते रहे हैं, साम्राज्य बदलते रहे हैं, राजधानियां बदलती रही हैं और सत्ता के केंद्र भी बदलते रहे हैं।
लेकिन सांस्कृतिक रिश्ते कई बार राजनीतिक सीमाओं से ज्यादा लंबे समय तक चलते हैं।
तब का भारत और आज का भारत
अगर 1947 से पहले के व्यापक भारतीय उपमहाद्वीप और आज के भारत की तुलना करें तो अंतर बहुत बड़ा दिखाई देता है।
| पहलू | 1947 के आसपास का व्यापक भारतीय भूगोल | आज का भारत |
|---|---|---|
| राजनीतिक स्थिति | ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की ओर बढ़ता उपमहाद्वीप | संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य |
| भूगोल | ब्रिटिश भारत और अनेक देशी रियासतों का जटिल ढांचा | निर्धारित अंतरराष्ट्रीय सीमाओं वाला भारत |
| विभाजन | भारत-पाकिस्तान का निर्माण | विभाजन के बाद विकसित स्वतंत्र भारत |
| जनसंख्या | विभाजन से पहले की संयुक्त आबादी | भारत की अपनी वर्तमान आबादी |
| अर्थव्यवस्था | औपनिवेशिक व्यवस्था से बाहर निकलने की चुनौती | विविध और तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था |
| राजनीति | स्वतंत्रता और सत्ता हस्तांतरण का दौर | संविधान आधारित संसदीय लोकतंत्र |
| सामाजिक चुनौती | सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन | सामाजिक सद्भाव, विकास और राष्ट्रीय एकता की चुनौती |
आज का भारत 1947 के भारत से सिर्फ इसलिए अलग नहीं है कि उसका नक्शा बदल गया। आज भारत ने एक संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं, चुनावी व्यवस्था, न्यायपालिका, संघीय ढांचे और आधुनिक अर्थव्यवस्था के साथ अपनी एक अलग राष्ट्रीय यात्रा तय की है।
इसलिए अखंड भारत की चर्चा करते समय आज के भारत की उपलब्धियों और वास्तविकताओं को नजरअंदाज करना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

विभाजन ने क्या सिखाया?
विभाजन की सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि नफरत की राजनीति का अंतिम परिणाम आम आदमी भुगतता है।
नेता भाषण देते हैं।
सीमाएं कागज पर खिंचती हैं।
लेकिन घर छोड़ने वाला आम आदमी होता है।
ट्रेन में बैठकर अपना गांव छोड़ने वाला आम आदमी होता है।
सालों की कमाई पीछे छोड़कर नए शहर में जिंदगी शुरू करने वाला आम आदमी होता है।
और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों ने विभाजन की आग देखी, उनमें से बहुत से लोग शायद कभी नहीं चाहते थे कि उनका पड़ोसी उनका दुश्मन बने।
इतिहास का यह अध्याय इसलिए याद रखना जरूरी है क्योंकि समाज जब अपनी साझा स्मृतियां भूलने लगता है, तब छोटी-छोटी दरारें बड़ी दीवारों में बदल सकती हैं।

अखंड भारत का सपना या मजबूत भारत का संकल्प?
अखंड भारत को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक विचार हो सकते हैं। कोई इसे सांस्कृतिक एकता के रूप में देखता है, कोई ऐतिहासिक भूगोल के रूप में और कोई राजनीतिक कल्पना के रूप में।
लेकिन आज के भारत के सामने एक ज्यादा व्यावहारिक सवाल भी है—
क्या हम वर्तमान भारत को इतना मजबूत, सुरक्षित, समृद्ध और सामाजिक रूप से एकजुट बना सकते हैं कि आने वाली पीढ़ियां विभाजन को सिर्फ इतिहास की किताब में पढ़ें, उसकी पीड़ा को दोहराना न पड़े?
क्योंकि अगर अखंडता की बात सिर्फ नक्शे तक सीमित रह जाए और समाज भीतर से बंटता रहे, तो फिर नक्शा कितना भी बड़ा क्यों न हो, राष्ट्र मजबूत नहीं कहलाएगा।
इसके उलट अगर देश के भीतर नागरिकों के बीच भरोसा, कानून का सम्मान, सामाजिक सद्भाव और विकास मजबूत हो, तो मौजूदा भारत की एकता कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण बनती है।
आज के भारत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी
14 अगस्त को याद करना केवल अतीत पर आंसू बहाना नहीं होना चाहिए।
यह सवाल पूछने का दिन भी होना चाहिए—
हमने इतिहास से क्या सीखा?
क्या हम अपने बच्चों को विभाजन की कहानी सिर्फ हिंदू-मुस्लिम या भारत-पाकिस्तान के चश्मे से बताएंगे?
या उन्हें यह भी बताएंगे कि उस दौर में इंसानियत के उदाहरण भी मौजूद थे?
ऐसे अनेक परिवार और व्यक्ति थे जिन्होंने मुश्किल समय में दूसरे समुदाय के लोगों की मदद की। यही इतिहास का दूसरा चेहरा है—हिंसा के बीच इंसानियत की छोटी-छोटी रोशनियां।
इसलिए विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का संदेश सिर्फ दर्द नहीं, मानवीय संवेदना और सामाजिक एकता भी होना चाहिए। भारत सरकार ने भी इस दिवस के उद्देश्य में भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना को दूर कर एकता तथा सामाजिक सद्भाव मजबूत करने पर जोर दिया है।
नक्शे से बड़ा राष्ट्र
अखंड भारत की कल्पना इतिहास में अपनी जगह रखती है। विभाजन की पीड़ा भी इतिहास का अटल सत्य है। और आज का भारत भी अपनी स्वतंत्र पहचान और संवैधानिक व्यवस्था के साथ एक वास्तविकता है।
इन तीनों को एक साथ समझना जरूरी है।
अखंड भारत हमें अपनी सभ्यतागत और सांस्कृतिक जड़ों की याद दिला सकता है।
विभाजन विभीषिका हमें नफरत और हिंसा की कीमत याद दिलाती है।
और आज का भारत हमें बताता है कि भविष्य का निर्माण वर्तमान को मजबूत करके ही होगा।
14 अगस्त इसलिए सिर्फ दुख का दिन नहीं है।
यह स्मृति का दिन है।
यह आत्ममंथन का दिन है।
और सबसे बढ़कर यह संकल्प लेने का दिन है कि इतिहास को भूलेंगे नहीं, लेकिन इतिहास की त्रासदियों को भविष्य की नियति भी नहीं बनने देंगे।
क्योंकि देश सिर्फ जमीन के टुकड़े से नहीं बनता।
देश बनता है—लोगों से, उनकी स्मृतियों से, उनके भरोसे से और उस साझा भविष्य से जिसे वे मिलकर बनाना चाहते हैं।
— मालवांचल मित्र, विशेष आलेख