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जन्मदिन विशेष : 31 जुलाई आते ही हिंदी साहित्य प्रेमचंद को याद करने लगता है। स्कूल की किताबों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शायद ही कोई ऐसा विद्यार्थी होगा जिसने कभी ईदगाह, पंच परमेश्वर या बूढ़ी काकी जैसी कहानियां न पढ़ी हों। लेकिन एक दिलचस्प सवाल अक्सर अनुत्तरित रह जाता है—इतनी सारी कहानियां लिखने वाले प्रेमचंद को खुद अपनी कौन-सी कहानियां सबसे अधिक पसंद थीं? यह सवाल जितना सरल लगता है, उसका जवाब उतना ही रोचक है। प्रेमचंद ने अपने साहित्य में राजाओं, परियों और काल्पनिक महलों की दुनिया नहीं बसाई। उन्होंने उन लोगों को अपनी कहानियों का नायक बनाया जो समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े थे। खेत में पसीना बहाने वाला किसान, रसोई में संघर्ष करती गृहिणी, बूढ़ी काकी, पंचायत में न्याय खोजता ग्रामीण, गरीबी से लड़ता बच्चा—यही उनके साहित्य की असली दुनिया थी। भारतीय गांव, वहां की मिट्टी, रिश्ते, संस्कार, गरीबी, अन्याय और मानवीय संवेदनाओं का जितना जीवंत चित्रण प्रेमचंद ने किया, वह हिंदी साहित्य में आज भी बेजोड़ माना जाता है। उनकी लगभग 300 से अधिक कहानियां बाद में 'मानसरोवर' नाम से आठ खंडों में प्रकाशित हुईं और आज विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं।
लेकिन कहानी यहां से और रोचक हो जाती है। सन 1928 में मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार आनंदराव जोशी ने प्रेमचंद को पत्र लिखकर उनकी कुछ कहानियों का मराठी अनुवाद करने की अनुमति मांगी। जवाब में 11 जनवरी 1928 को प्रेमचंद ने न केवल सहमति दी, बल्कि अपनी कुछ ऐसी कहानियां भी सुझाईं जिन्हें वे स्वयं विशेष रूप से पसंद करते थे। बाद में दोनों साहित्यकारों के बीच पत्राचार चलता रहा और इस सूची में थोड़ा परिवर्तन भी हुआ। अंततः वर्ष 1929 में पुणे की प्रसिद्ध चित्रशाला प्रेस से आनंदराव जोशी द्वारा मराठी में अनूदित प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियों का संग्रह 'प्रेमचंदाच्या गोष्ठी' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में शामिल थीं ये 14 कहानियां—
दिलचस्प बात यह है कि आज जब प्रेमचंद का नाम लिया जाता है तो अक्सर ईदगाह, कफन, नमक का दरोगा जैसी कहानियां सबसे पहले याद आती हैं। लेकिन उनकी अपनी पसंद की सूची हमें यह बताती है कि एक लेखक अपने साहित्य को पाठकों से बिल्कुल अलग नजरिए से भी देखता है। कई बार जो रचना पाठकों की सबसे बड़ी पसंद बन जाती है, वह लेखक की निजी पसंद हो, यह जरूरी नहीं।
शायद यही साहित्य की सबसे खूबसूरत बात है—हर पाठक अपनी कहानी चुनता है और हर लेखक अपने दिल के थोड़ा और करीब कुछ दूसरी कहानियां संभालकर रखता है। प्रेमचंद की कहानियां केवल मनोरंजन नहीं करतीं, वे समाज का आईना दिखाती हैं। वे हमें संवेदनशील बनाती हैं, सवाल पूछना सिखाती हैं और यह एहसास कराती हैं कि साहित्य का सबसे बड़ा विषय हमेशा इंसान ही रहा है। आज प्रेमचंद जयंती पर इस महान कथाकार, 'कलम के सिपाही' और भारतीय समाज के अद्वितीय चित्रकार को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी कहानियां आने वाली पीढ़ियों को भी उतनी ही सादगी, संवेदना और सच्चाई के साथ जीवन का पाठ पढ़ाती रहेंगी।
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जन्मदिन विशेष : 31 जुलाई आते ही हिंदी साहित्य प्रेमचंद को याद करने लगता है। स्कूल की किताबों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शायद ही कोई ऐसा विद्यार्थी होगा जिसने कभी ईदगाह, पंच परमेश्वर या बूढ़ी काकी जैसी कहानियां न पढ़ी हों। लेकिन एक दिलचस्प सवाल अक्सर अनुत्तरित रह जाता है—इतनी सारी कहानियां लिखने वाले प्रेमचंद को खुद अपनी कौन-सी कहानियां सबसे अधिक पसंद थीं?
यह सवाल जितना सरल लगता है, उसका जवाब उतना ही रोचक है।
प्रेमचंद ने अपने साहित्य में राजाओं, परियों और काल्पनिक महलों की दुनिया नहीं बसाई। उन्होंने उन लोगों को अपनी कहानियों का नायक बनाया जो समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े थे। खेत में पसीना बहाने वाला किसान, रसोई में संघर्ष करती गृहिणी, बूढ़ी काकी, पंचायत में न्याय खोजता ग्रामीण, गरीबी से लड़ता बच्चा—यही उनके साहित्य की असली दुनिया थी।
भारतीय गांव, वहां की मिट्टी, रिश्ते, संस्कार, गरीबी, अन्याय और मानवीय संवेदनाओं का जितना जीवंत चित्रण प्रेमचंद ने किया, वह हिंदी साहित्य में आज भी बेजोड़ माना जाता है। उनकी लगभग 300 से अधिक कहानियां बाद में 'मानसरोवर' नाम से आठ खंडों में प्रकाशित हुईं और आज विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं।

लेकिन कहानी यहां से और रोचक हो जाती है।
सन 1928 में मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार आनंदराव जोशी ने प्रेमचंद को पत्र लिखकर उनकी कुछ कहानियों का मराठी अनुवाद करने की अनुमति मांगी। जवाब में 11 जनवरी 1928 को प्रेमचंद ने न केवल सहमति दी, बल्कि अपनी कुछ ऐसी कहानियां भी सुझाईं जिन्हें वे स्वयं विशेष रूप से पसंद करते थे।
बाद में दोनों साहित्यकारों के बीच पत्राचार चलता रहा और इस सूची में थोड़ा परिवर्तन भी हुआ। अंततः वर्ष 1929 में पुणे की प्रसिद्ध चित्रशाला प्रेस से आनंदराव जोशी द्वारा मराठी में अनूदित प्रेमचंद की पसंदीदा कहानियों का संग्रह 'प्रेमचंदाच्या गोष्ठी' प्रकाशित हुआ।
इस संग्रह में शामिल थीं ये 14 कहानियां—
दिलचस्प बात यह है कि आज जब प्रेमचंद का नाम लिया जाता है तो अक्सर ईदगाह, कफन, नमक का दरोगा जैसी कहानियां सबसे पहले याद आती हैं। लेकिन उनकी अपनी पसंद की सूची हमें यह बताती है कि एक लेखक अपने साहित्य को पाठकों से बिल्कुल अलग नजरिए से भी देखता है। कई बार जो रचना पाठकों की सबसे बड़ी पसंद बन जाती है, वह लेखक की निजी पसंद हो, यह जरूरी नहीं।

शायद यही साहित्य की सबसे खूबसूरत बात है—हर पाठक अपनी कहानी चुनता है और हर लेखक अपने दिल के थोड़ा और करीब कुछ दूसरी कहानियां संभालकर रखता है।
प्रेमचंद की कहानियां केवल मनोरंजन नहीं करतीं, वे समाज का आईना दिखाती हैं। वे हमें संवेदनशील बनाती हैं, सवाल पूछना सिखाती हैं और यह एहसास कराती हैं कि साहित्य का सबसे बड़ा विषय हमेशा इंसान ही रहा है।
आज प्रेमचंद जयंती पर इस महान कथाकार, 'कलम के सिपाही' और भारतीय समाज के अद्वितीय चित्रकार को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी कहानियां आने वाली पीढ़ियों को भी उतनी ही सादगी, संवेदना और सच्चाई के साथ जीवन का पाठ पढ़ाती रहेंगी।