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मालवांचल मित्र | संपादकीय
कभी पुस्तकालय जाना अपने आप में एक अनुभव हुआ करता था। लकड़ी की अलमारियों में सजी किताबें, पन्ने पलटने की आवाज, शांत वातावरण और किसी पुराने ग्रंथ से अचानक मिल जाने वाला कोई ऐसा विचार, जो घंटों दिमाग में घूमता रहे। पुस्तकालय सिर्फ किताबें रखने की जगह नहीं था, बल्कि वह समाज का ज्ञान-केंद्र हुआ करता था।
लेकिन समय बदला। हाथ में किताब की जगह मोबाइल आ गया और पुस्तकालय की अलमारी की जगह अब स्क्रीन ने ले ली है। आज किसी भी सवाल का जवाब चाहिए तो हम गूगल कर लेते हैं, वीडियो देख लेते हैं या एआई से पूछ लेते हैं। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है—क्या आज पुस्तकालयों का महत्व कम हो रहा है?
सच कहें तो पुस्तकालय खत्म नहीं हो रहे, लेकिन पुस्तकालय जाने की हमारी आदत जरूर कमजोर हुई है।

डॉ. एस. आर. रंगनाथन ने पुस्तकालय को सिर्फ किताबों का कमरा नहीं माना
12 अगस्त 1892 को जन्मे डॉ. एस. आर. रंगनाथन को भारत में पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान का जनक माना जाता है। उनका पूरा नाम शियाली रामामृत रंगनाथन था। उन्होंने भारत में पुस्तकालय आंदोलन को एक नई दिशा दी और पुस्तकालय विज्ञान को व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके प्रसिद्ध पुस्तकालय विज्ञान के पाँच नियम आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं—
आखिरी नियम आज के डिजिटल दौर में शायद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है—पुस्तकालय एक वर्धमान संस्था है।
यानी पुस्तकालय को समय के साथ बदलना ही होगा।
आज पुस्तकालय से दूरी क्यों बढ़ रही है?
आज के युवा के सामने जानकारी की कोई कमी नहीं है। समस्या उलटी है—जानकारी इतनी ज्यादा है कि सही जानकारी चुनना मुश्किल हो गया है।
मोबाइल पर एक क्लिक में हजारों किताबें उपलब्ध हैं। सोशल मीडिया पर छोटे-छोटे वीडियो ज्ञान का दावा करते दिखाई देते हैं। ऑनलाइन आर्टिकल, ब्लॉग, पॉडकास्ट और एआई टूल्स ने जानकारी तक पहुंच बेहद आसान कर दी है।
लेकिन यहां एक छोटी-सी समस्या है—जानकारी और ज्ञान एक ही चीज नहीं हैं।
व्हाट्सऐप पर आया संदेश पढ़ लेना ज्ञान नहीं है। किसी रील में किसी ने कुछ कह दिया, इसका मतलब वह तथ्य नहीं हो जाता। इंटरनेट पर उपलब्ध हर सामग्री प्रमाणिक भी नहीं होती।
यहीं पर पारंपरिक पुस्तकालय की भूमिका फिर सामने आती है।
एक अच्छी लाइब्रेरी हमें सिर्फ किताब नहीं देती, बल्कि विश्वसनीय स्रोत तक पहुंच देती है। प्रशिक्षित पुस्तकालयाध्यक्ष पाठक को सही पुस्तक, संदर्भ सामग्री और सूचना खोजने का तरीका बता सकता है।

तो क्या मोबाइल और इंटरनेट पुस्तकालय के दुश्मन हैं?
बिल्कुल नहीं।
असल में मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल तकनीक को पुस्तकालय का दुश्मन नहीं, बल्कि नया साथी बनाना चाहिए।
यहीं से ई-लाइब्रेरी की जरूरत सामने आती है।
ई-लाइब्रेरी यानी ऐसी डिजिटल व्यवस्था, जहां किताबें, शोध-पत्र, जर्नल, रिपोर्ट, समाचार-पत्र और अन्य शैक्षणिक सामग्री इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध हो सकती है।
अब किसी विद्यार्थी को किसी दुर्लभ पुस्तक के लिए दूसरे शहर की लाइब्रेरी तक जाने की जरूरत हमेशा नहीं पड़ती। यदि वह सामग्री डिजिटल रूप में उपलब्ध है, तो मोबाइल, टैबलेट या कंप्यूटर के माध्यम से उसे पढ़ा जा सकता है।
ई-लाइब्रेरी का इस्तेमाल कैसे करें?
आज विद्यार्थी और आम पाठक कई वैध डिजिटल पुस्तकालयों और शैक्षणिक संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए—
सबसे जरूरी बात यह है कि ई-लाइब्रेरी का मतलब इंटरनेट पर मुफ्त में मिली हर PDF डाउनलोड करना नहीं है। कॉपीराइट और विश्वसनीयता दोनों का ध्यान रखना जरूरी है।
भविष्य की लाइब्रेरी कैसी होगी?
शायद आने वाले समय की लाइब्रेरी में किताबें भी होंगी और कंप्यूटर भी। अलमारियां भी होंगी और डिजिटल स्क्रीन भी। पुस्तकालयाध्यक्ष सिर्फ किताब जारी करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि इन्फॉर्मेशन गाइड की भूमिका निभाएगा।
विद्यार्थी पुस्तकालय में बैठकर ई-बुक पढ़ेगा, शोध-पत्र डाउनलोड करेगा, डिजिटल कैटलॉग से किताब खोजेगा और जरूरत पड़ने पर किसी विशेषज्ञ डेटाबेस तक पहुंचेगा।
यानी भविष्य का पुस्तकालय कागज और तकनीक का मुकाबला नहीं, उनका मेल होगा।
और शायद यही डॉ. रंगनाथन के विचारों की असली भावना भी है। अगर उन्होंने कहा कि पुस्तकालय एक वर्धमान संस्था है, तो इसका अर्थ यही है कि पुस्तकालय को समाज की बदलती जरूरतों के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
पुस्तकालय को बचाने के लिए सिर्फ किताबें खरीदना काफी नहीं
आज कई जगह पुस्तकालयों में किताबें तो हैं, लेकिन पाठक कम हैं। कहीं पाठक हैं तो डिजिटल सुविधा नहीं है। कहीं कंप्यूटर हैं तो इंटरनेट कमजोर है। और कहीं इंटरनेट है तो उपयोग करने का प्रशिक्षण नहीं है।
इसलिए जरूरत सिर्फ नई किताबें खरीदने की नहीं, बल्कि पुस्तकालय को आधुनिक ज्ञान-केंद्र बनाने की है।
स्कूल-कॉलेजों में नियमित लाइब्रेरी पीरियड, डिजिटल कैटलॉग, ई-रिसोर्स, अच्छी इंटरनेट सुविधा और विद्यार्थियों को सूचना खोजने का प्रशिक्षण—ये सभी जरूरी हैं।
वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि हमारे पास हजारों किताबें होंगी और उन्हें पढ़ने वाला मोबाइल पर व्यस्त होगा।
पुस्तकालय बदलेगा, तभी बच पाएगा
आज पुस्तकालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती मोबाइल नहीं है। असली चुनौती है—क्या हम ज्ञान के लिए समय निकालना चाहते हैं?
किताब कागज पर हो या स्क्रीन पर, उसका महत्व तभी है जब हम उसे पढ़ें, समझें और अपने जीवन में उतारें।
डॉ. एस. आर. रंगनाथन ने जिस पुस्तकालय की कल्पना की थी, वह केवल चार दीवारों और अलमारियों तक सीमित नहीं था। वह समाज को ज्ञान से जोड़ने वाली व्यवस्था थी।
आज जरूरत है कि हम उस सोच को डिजिटल युग से जोड़ें।
पुस्तकालय को बंद करने की नहीं, उसे बदलने की जरूरत है।
किताब को छोड़ने की नहीं, किताब तक पहुंच के तरीके बदलने की जरूरत है।
और सबसे बढ़कर—पढ़ने की आदत को फिर से मजबूत करने की जरूरत है।
क्योंकि मोबाइल हमें हजारों सूचनाएं दे सकता है, लेकिन एक अच्छी किताब कई बार हमें सोचने का तरीका देती है।
और यही कारण है कि पुस्तकालय आज भी जरूरी है—बस अब उसकी अलमारी के साथ उसकी स्क्रीन भी खुली रहनी चाहिए।
— संपादकीय, मालवांचल मित्र