• रुपये की ऐतिहासिक गिरावट : अमेरिकी डॉलर के सामने 92 तक फिसला भारतीय रुपया

    PRAVEEN ARONDEKAR   - दिल्ली
    रुपये की ऐतिहासिक गिरावट
    व्यापार   - दिल्ली[02-02-2026]
  • मालवांचल मित्र, नई दिल्ली: विदेशी मुद्रा बाज़ार में भारतीय रुपये ने एक नया नकारात्मक रिकॉर्ड बना लिया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 92 के स्तर तक पहुँच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। रुपये में आई इस ऐतिहासिक गिरावट ने न केवल वित्तीय बाज़ारों में हलचल बढ़ा दी है, बल्कि आम जनता और निवेशकों की चिंताओं को भी गहरा कर दिया है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, विदेशी निवेश की निकासी और बढ़ते चालू खाता घाटे के बीच रुपये की यह कमजोरी देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है।

    मुद्रा बाज़ार की मौजूदा स्थिति

    भारतीय रुपया इन दिनों विदेशी मुद्रा बाज़ार में लगातार दबाव का सामना कर रहा है। 29 जनवरी 2026 को रुपया पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 के स्तर तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, चालू महीने में ही रुपये में लगभग 2.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह सितंबर 2022 के बाद की सबसे बड़ी मासिक कमजोरी है।

    गिरावट के प्रमुख कारण

    रुपये की कमजोरी ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी हुई है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी निकाल रहे हैं, जिससे नए निवेश में कमी आई है।

    इसके अलावा अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ने से वहाँ निवेश अधिक आकर्षक हो गया है। नतीजतन, निवेशक जोखिम वाले बाजारों से दूरी बना रहे हैं। वहीं भारत का बढ़ता चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD) भी रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना रहा है।

    आर्थिक सर्वेक्षण 2026: सरकार की राय

    आर्थिक सर्वेक्षण की प्रेस वार्ता में मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि रुपये की गिरावट को केवल घरेलू दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह वैश्विक परिघटना है और उन देशों की मुद्राएँ भी प्रभावित हुई हैं, जिनका चालू खाता घाटा अधिक है।

    उन्होंने मीडिया से संतुलित रिपोर्टिंग की अपील करते हुए कहा कि भ्रामक या अतिरंजित सुर्खियाँ वास्तविक स्थिति को गलत तरीके से प्रस्तुत करती हैं। उनके अनुसार, रुपये की मौजूदा कमजोरी भारत की आर्थिक बुनियाद को कमजोर नहीं करती और न ही इसका देश की समग्र मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति से कोई नकारात्मक संबंध है।

    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की स्थिति

    FDI को लेकर उठ रही चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए CEA ने बताया कि भारत में ग्रॉस एफडीआई की स्थिति संतोषजनक बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025–26 में इसमें पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि नेट एफडीआई में आई गिरावट का मुख्य कारण दीर्घकालिक निवेशकों द्वारा मुनाफे की वापसी और भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में बढ़ता निवेश है। साथ ही विकसित देशों में ब्याज दरों का शून्य से बढ़कर 4–5 प्रतिशत तक पहुँचना वैश्विक निवेश प्रवृत्तियों को प्रभावित कर रहा है।

    आम जनता पर प्रभाव

    तत्काल तौर पर रुपये की गिरावट का असर रोज़मर्रा के खर्चों पर सीमित रहेगा, लेकिन लंबे समय में इसके प्रभाव स्पष्ट हो सकते हैं। विशेष रूप से वे परिवार जो विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्रों को आर्थिक सहायता देते हैं, उन्हें अधिक खर्च का सामना करना पड़ सकता है।

    इसके अलावा विदेशी यात्राएँ और आयातित वस्तुएँ जैसे कच्चा तेल और सोना महंगे हो सकते हैं। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई दर (CPI) पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है। वहीं दूसरी ओर, निर्यातकों के लिए कमजोर रुपया फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी कमाई बढ़ेगी।

    ताज़ा बाज़ार अपडेट

    शुक्रवार, 30 जनवरी की शुरुआती ट्रेडिंग में रुपये में हल्की मजबूती देखी गई, हालांकि यह अब भी 92 के स्तर के आसपास बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से रुपये को कुछ सहारा मिला और यह डॉलर के मुकाबले लगभग 91.90 पर कारोबार करता दिखा, जिसमें करीब 9 पैसे की बढ़त दर्ज की गई।



  • रुपये की ऐतिहासिक गिरावट : अमेरिकी डॉलर के सामने 92 तक फिसला भारतीय रुपया

    PRAVEEN ARONDEKAR   - दिल्ली
    रुपये की ऐतिहासिक गिरावट
    व्यापार   - दिल्ली[02-02-2026]

    मालवांचल मित्र, नई दिल्ली: विदेशी मुद्रा बाज़ार में भारतीय रुपये ने एक नया नकारात्मक रिकॉर्ड बना लिया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 92 के स्तर तक पहुँच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। रुपये में आई इस ऐतिहासिक गिरावट ने न केवल वित्तीय बाज़ारों में हलचल बढ़ा दी है, बल्कि आम जनता और निवेशकों की चिंताओं को भी गहरा कर दिया है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, विदेशी निवेश की निकासी और बढ़ते चालू खाता घाटे के बीच रुपये की यह कमजोरी देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है।

    मुद्रा बाज़ार की मौजूदा स्थिति

    भारतीय रुपया इन दिनों विदेशी मुद्रा बाज़ार में लगातार दबाव का सामना कर रहा है। 29 जनवरी 2026 को रुपया पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 के स्तर तक फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, चालू महीने में ही रुपये में लगभग 2.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह सितंबर 2022 के बाद की सबसे बड़ी मासिक कमजोरी है।

    गिरावट के प्रमुख कारण

    रुपये की कमजोरी ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी हुई है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी निकाल रहे हैं, जिससे नए निवेश में कमी आई है।

    इसके अलावा अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में ब्याज दरें बढ़ने से वहाँ निवेश अधिक आकर्षक हो गया है। नतीजतन, निवेशक जोखिम वाले बाजारों से दूरी बना रहे हैं। वहीं भारत का बढ़ता चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD) भी रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना रहा है।

    आर्थिक सर्वेक्षण 2026: सरकार की राय

    आर्थिक सर्वेक्षण की प्रेस वार्ता में मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि रुपये की गिरावट को केवल घरेलू दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह वैश्विक परिघटना है और उन देशों की मुद्राएँ भी प्रभावित हुई हैं, जिनका चालू खाता घाटा अधिक है।

    उन्होंने मीडिया से संतुलित रिपोर्टिंग की अपील करते हुए कहा कि भ्रामक या अतिरंजित सुर्खियाँ वास्तविक स्थिति को गलत तरीके से प्रस्तुत करती हैं। उनके अनुसार, रुपये की मौजूदा कमजोरी भारत की आर्थिक बुनियाद को कमजोर नहीं करती और न ही इसका देश की समग्र मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति से कोई नकारात्मक संबंध है।

    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की स्थिति

    FDI को लेकर उठ रही चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए CEA ने बताया कि भारत में ग्रॉस एफडीआई की स्थिति संतोषजनक बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025–26 में इसमें पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि नेट एफडीआई में आई गिरावट का मुख्य कारण दीर्घकालिक निवेशकों द्वारा मुनाफे की वापसी और भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में बढ़ता निवेश है। साथ ही विकसित देशों में ब्याज दरों का शून्य से बढ़कर 4–5 प्रतिशत तक पहुँचना वैश्विक निवेश प्रवृत्तियों को प्रभावित कर रहा है।

    आम जनता पर प्रभाव

    तत्काल तौर पर रुपये की गिरावट का असर रोज़मर्रा के खर्चों पर सीमित रहेगा, लेकिन लंबे समय में इसके प्रभाव स्पष्ट हो सकते हैं। विशेष रूप से वे परिवार जो विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्रों को आर्थिक सहायता देते हैं, उन्हें अधिक खर्च का सामना करना पड़ सकता है।

    इसके अलावा विदेशी यात्राएँ और आयातित वस्तुएँ जैसे कच्चा तेल और सोना महंगे हो सकते हैं। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई दर (CPI) पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है। वहीं दूसरी ओर, निर्यातकों के लिए कमजोर रुपया फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी कमाई बढ़ेगी।

    ताज़ा बाज़ार अपडेट

    शुक्रवार, 30 जनवरी की शुरुआती ट्रेडिंग में रुपये में हल्की मजबूती देखी गई, हालांकि यह अब भी 92 के स्तर के आसपास बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से रुपये को कुछ सहारा मिला और यह डॉलर के मुकाबले लगभग 91.90 पर कारोबार करता दिखा, जिसमें करीब 9 पैसे की बढ़त दर्ज की गई।